बुधवार, 22 मार्च 2023

ब्राह्मण.ग्रन्थ

 

ब्राह्मण.ग्रन्थ

ब्रह्म का अर्थ यज्ञ होता है अतः यज्ञ विषयों के प्रतिपादक ग्रंथों को ब्राह्मण ग्रंथ कहा गया। संहिता ग्रंथ जहां स्तुति प्रधान है वहीं  ब्राह्मण ग्रंथ विधि प्रधान है।  यह गद्य रूप में आर्यों के प्राचीनतम ग्रंथ है। इनमें वैदिक मंत्रों का अर्थ स्पष्ट किया गया है। इनकी रचना यज्ञ आदि विधानों के प्रतिपादन और उनकी क्रियाओं को समझाने के उद्देश्य से की गई थी। वेद संहिताओं की गद्य टीकाओं को ब्राह्मण कहा जाता है। वेद संहिताओं के बाद ब्राह्मण.ग्रन्थों का निर्माण हुआ माना जाता है।

इनमें यज्ञों के कर्मकाण्ड का विस्तृत वर्णन है, साथ ही शब्दों की व्युत्पत्तियाँ तथा प्राचीन राजाओं और ऋषियों की कथाएँ तथा सृष्टि.सम्बन्धी विचार हैं। पुरातन ब्राह्मण में ऐतरेयए शतपथ, पंचविश, तैतरीय आदि विशेष महत्वपूर्ण हैं। ऐतरेय के अध्ययन से राज्याभिषेक तथा अभिषिक्त नृपतियों के नामों का ज्ञान प्राप्त होता है। शथपथ के एक सौ अध्याय भारत के पश्चिमोत्तर के गान्धार, शाल्य तथा केकय आदि और प्राच्य देश, कुरु, पांचाल, कोशल तथा विदेह के संबंध में ऐतिहासिक कहानियाँ प्रस्तुत करते हैं। राजा परीक्षित की कथा ब्राह्मणों द्वारा ही अधिक स्पष्ट हो पायी है।

प्रत्येक वेद के अपने ब्राह्मण  ग्रंथ  हैं।

ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं . 1.  ऐतरेय ब्राह्मण और 2. कौषीतकी।

 ऐतरेय में अग्निष्टोम, गवामयन, द्वादशाह आदि सोम यज्ञों, अग्निहोत्र तथा राज्याभिषेक का विस्तृत वर्णन है। इनसे तत्कालीन इतिहास पर काफी प्रकाश पड़ता है। ऐतरेय में शुनःशेप की प्रसिद्ध कथा है।

ऐतरेय ब्राह्मण महिदास ऐतरेय की रचना है इसमें बड़े.बड़े सोम स्तवो   और राज्य अभिषेक के विविध यज्ञ विधानो  का प्रतिपादन है। इसमें गांधार, कैकेय ,  शल्य ,कुरु ,पांचाल विदेह  आदि राजाओं के नामों का भी उल्लेख है।

कौषीतकी से प्रतीत होता है कि उत्तर भारत में भाषा के सम्यक् अध्ययन पर बहुत बल दिया जाता था।

शुनःशेप की कथा ऐतरेय ब्राह्मण में  है।  यह आख्यान मानवीय लोभ, बेइमानी और उससे ऊपर उठने की कथा है।

निःसंतान राजा हरिश्चंद्र ने वरुण देवता की उपासना इस प्रण के साथ  की कि  अगर मुझे पुत्र प्राप्ति होगी तो  पहला पुत्र आपको समर्पित कर दूंगा जल्दी ही उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो गई, जिसका नाम रोहित रखा गया। लेकिन राजा  पुत्र मोह में किसी किसी बहाने रोहित को वरुण देवता को सौंपने की बात टालता रहा। पिता कहीं उसे सचमुच वरुण देव को नहीं अर्पित कर दें, इस डर से रोहित जंगल में भाग गया और हरिश्चन्द्र ने अपना प्रण पूरा नहीं कर पाया  इस पर वरुण ने उसे शाप दे दिया और वह बीमार हो गया।

 रोहित को एक स्त्री एक गरीब ब्राह्मण अजीगर्त के पास ले आयी।  अजीगर्त के तीन बेटे थे - शुन:पुच्छ, शुन:लांगूल और शुन:शेप।  अजीगर्त ने लालच में आकर रोहित से कहा कि सौ गायों के बदले वह अपने एक पुत्र को बेचने को तैयार है। जिसे  वह अपने बदले वरुण देवता को सौंप कर अपनी जान बचा सकता है।

 शुन:शेप ने सोचा, छोटा भाई मां का लाड़ला है, बड़ा भाई पिता का लाड़ला है, यदि मैं चला जाऊं तो दोनों में से किसी को कोई दुःख  नहीं होगा। इसलिए वह खुद रोहित के साथ जाने को तैयार हो गया।

वरुण देव  भी अनुष्ठान के लिए क्षत्रिय बालक के बदले ब्राह्मण बालक मिलता हुआ देख इस हेतु तैयार हो गए

यज्ञ में नर बलि की तैयारी शुरू हुई।  ब्राह्मण की हत्या कौन करे? इस मुद्दे पर पुरोहितों ने मना कर दिया।  तब अजीगर्त सौ गायों के बदले अपने बेटे को काटने के लिए भी तैयार हो गया।

निसहाय  शुन:शेप ने प्राण रक्षा  हेतु ऊषा देवता का स्तवन शुरू किया। प्रत्येक ऋचा के साथ शुन:शेप का एक-एक बंधन टूटता गया और अंतिम ऋचा के साथ केवल शुन:शेप मुक्त हो गया, बल्कि राजा हरिश्चंद भी श्राप मुक्त हो गए।

इस पूरी घटना से विरक्त हो  बालक शुन:शेप, ऋषि शुन:शेप बन गया।

 

 

पंचविंश (तांडव),  षड विंश (अद्भुत), छदोग्य ,जैमीनीय (तालवंकार) सामवेद के ब्राह्मण है।

सामवेद से संबंधित पंचविंश  ब्राह्मण जिसे   तांडव ब्राह्मण भी कहते हैं में  व्रात्यस्तोम  विधि का वर्णन है, जिसके द्वारा    अनार्य भी आर्य परिवार में शामिल किया जा सकता है।

षंडविंश   ब्राह्मण में शकुन और अनेक अलौकिक बातों की चर्चा है इसका अंतिम अध्याय अद्भुत ब्राह्मण कहलाता है। जैमिनीय ब्राह्मण का दूसरा नाम तालवंकार ब्राह्मण है।

शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण शतपथ के नाम से प्रसिद्ध है, क्योंकि इसमें सौ अध्याय हैं। ऋग्वेद के बाद प्राचीन इतिहास की सबसे अधिक जानकारी इसी से मिलती है। इसमें यज्ञों के विस्तृत वर्णन के साथ अनेक प्राचीन आख्यानों, व्युत्पत्तियों तथा सामाजिक बातों का वर्णन है। इसके समय में कुरु-पांचाल आर्य संस्कृति का केन्द्र था, इसमें पुरूरवा और उर्वशी की प्रणय-गाथा, च्यवन ऋषि तथा महा प्रलय का आख्यान, जनमेजय, शकुन्तला और भरत का उल्लेख है।

शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ सबसे बड़ा ब्राह्मण ग्रंथ है। यह वाजसनेयी  संहिता की टीका है और उसी की तरह इसकी भी काण्व  में और माध्यनंदिनी शाखाएं हैं।

तैतरीय ब्राह्मण का संबंध भी यजुर्वेद से है यह ब्राह्मण ग्रंथों में सबसे प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथ है। जिसका संबंध कृष्ण यजुर्वेद से है। अर्थात  तैतरीय  ब्राह्मण आर्यों की सबसे प्राचीन गद्य रचना है। ऐतरेय और कौषीतकी   जिनका संबंध ऋग्वेद से है उसके बाद की रचनाएं हैं।

सबसे बाद का ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ ब्राह्मण है।

 कृष्ण यजुर्वेद में संहिता और ब्राह्मण ग्रंथ दोनों शामिल है। तैतरीय ब्राह्मण में केवल वे ही अंश  है जो पीछे से तैतरीय संहिता में जोड़े गए थे।

 अथर्ववेद का ब्राह्मण गोपथ के नाम से प्रसिद्ध है।

वेद

 

वेद- वेद ब्राह्मण साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ हैं, जिसमें प्राचीन आर्यों की संपूर्ण जीवन की झलक मिलती हैं। वेदों की रचना पद्यमय होने के कारण इनको संहिता भी कहा गया हैं। अर्थात इसका मंत्रखंड संहिता कहलाता हैं। वेदों को संकलित करने का श्रेय महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास को दिया जाता हैं।

- भारतीय परम्परा में वेदों को नित्य और अपौरूषेय माना गया हैं। मौखिक परम्परा द्वारा आगे बढ़ने के कारण इनको श्रुती भी कहा गया हैं।

- वेदों से ऐतिहासिक महत्व की जानकारी की अपेक्षा सांस्कृतिक मूल्यों की जानकारी अधिक मिलती हैं।

- वेदों को संख्या चार हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद, जिसमें से ऋग्वेद भारतीय आर्यों की ही नहीं वरन् समस्त आर्य जाति की प्राचीनतम रचना हैं।

ऋग्वेद

ऋग्वेद में 10 मंडल, बालखिल्य के 11 सूक्तों (जो कुछ विद्वान अलग मानते हैं) सहित 1028 सूक्त और 10580 मंत्र हैं।

इन सूक्तों में यद्यपि देव स्तुति की ही प्रधानता हैं, तथापि कुछ मंत्रों का ऐतिहासिक महत्व भी हैं।

* जैसे एक स्थान पर दशराज्ञ युद्ध के विवरण से तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों का ब्यौरा मिलता हैं। इस युद्ध में जो रावी नदी (पुरूष्णी) के किनारे लड़ा गया था, में सुदास नामक राजा ने उसके पूर्व पुरोहित विश्वामित्र के नेतृत्व में लड़ने वाले दस राजाओं को परास्त किया था। (सुदास ने वशिष्ट को पुरोहित नियुक्त किया था) डी. डी. कोशाम्बी के अनुसार इस युद्ध का कारण यह था कि ये दस राजा रावी नदी के बहाव की दिशा परिवर्तित करना चाहते थे।

* ऋग्वेद के दूसरे से सांतवें मंडल तक के मंडल सर्वाधिक प्राचीन हैं, जो ऋषियों के कतिपय परिवारों की रचना होने के कारण गोत्र मंडल/परिवार मंडल या वंश मंडल के नाम से जाने जाते हैं। इनके रचयिताओं का विवरण इस प्रकार हैं- द्वितीय मंडल- गृहत्समद, तृतीय मंडल- विश्वामित्र, चतुर्थ मंडल- वामदेव, पंचम मंडल- अत्रि, षष्ठ मंडल- भारद्वाज, सप्तम मंडल- वशिष्ट।

- अष्टम मंडल को वंश मंडल की श्रेणी में नहीं रखा जाता हैं, के रचयिता कण्व अंगिरस ऋषि हैं।

- ऋग्वेद के नौवें मंडल में अन्य मंडलों में सोम को संबोधित कर गई ऋषाओं का संकलन हैं। (ऋषा से तात्पर्य हें वैदिक पद्य)।

- ऋग्वेद के प्रथम और दसम् मंडल को क्षेपक माना जाता हैं। कृषि विवरणों से युक्त चतुर्थ मंडल का 8 श्लोकों वाला 57 वां सूक्त भी भाषा विज्ञान की दृष्टि से क्षेपक हैं।

- पुरूष सूक्त नामक प्रसिद्ध सूक्त दसवें मंडल का भाग हैं, जिसे आदि महामानव के सिर से ब्राह्मण की/बाहु से क्षत्रिय की/जंघा से वैश्य की और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति बताई गई हैं।

·         प्रसिद्ध गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में संकलित हैं, जो देवी सविता को समर्पित हैं।

·         लोपा, मुद्रा, घोषा, शची, पौलामी, काक्षावृति जैसी ऋग्वैदिक मंत्र रचयिता नारियों के उल्लेख से तत्कालीन स्त्री स्थिति की जानकारी प्राप्त होती हैं।

·         चौथा मंडल के तीन मंत्रों की रचना तीन राजाओं त्रासदस्यु, अजमीढ और पुरमीढ़ ने की थी।

·         ऋग्वेद में सोम यज्ञ का वर्णन सर्वाधिक बार आया हैं।

·         ऋग्वेद के सूक्तों को चौदहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में दक्षिण भारत में ठीक तरह से संपादित और लिपिबद्ध किया गया था, तब तक ऋग्वेद के पाठ को कंठस्थ रखा जाता था।

·         यज्ञ विधान में ऋग्वेद की ऋषाओं का गायक पुरोहितहोताकहलाता था।

यजुर्वेद

यजुर्वेद का संकलन गद्य और पद्य दोनों में हुआ हैं। (यजुष= गद्य) सामवेद की ही तरह इसकी भी अधिकतर ऋषाएं ऋग्वेद से ली गई हैं। यजुर्वेद में यज्ञ के नियमों और विधि विधानों का संकलन हैं। इस वेद के आधार पर यज्ञ के कर्मकांडों का संपादन कराने वाले पुरोहितों को अध्वर्यु कहा जाता था।

यजुर्वेद के दो प्रकार हैं- शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद।

शुक्ल यजुर्वेद की मुख्य शाखाएं काण्व और माध्यनंदिनी हैं, जिन्हें वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता हैं, क्योंकि वाजसनेयी के पुत्र इनके प्रथम दृष्टा थे।

वाजसनेयी सहिता अर्थात् शुक्ल यजुर्वेद में केवल ऋषाएं, सूक्त और यज्ञीय सूत्र (मंत्र) हैं, जबकि कृष्ण यजुर्वेद संहिता में छंदबद्ध मंत्रों के अलावा गद्य भाष्य भी हैं, जिनकी गणना ब्राह्मण में की जाती हैं।

कृष्ण यजुर्वेद की शाखाओं के नाम हैं- काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी और तैतरीय।

·         यजुर्वेद में ही सर्वप्रथम राजसुय और वाजपेय यज्ञों जैसे राजकीय समारोहों का उल्लेख हैं। अन्य यज्ञों का भी विधान हैं- जैसे अश्वमेघ, अग्निहोत्र, सोमयज्ञ, सौमित्राणि, चातुर्मास, दसपूर्णमास आदि।

सामवेद

साम का अर्थ हैं- गेय पद्य , जो यज्ञ के अवसर परउद्गातापुरोहितों द्वारा गाये जाते थे। ऐसे 1810 मंत्रों का संकलन सामवेद में हैं। इनमें से 75 ऋषाएं ही नई हैं, बाकि ऋषाएं ऋग्वेद से ग्रहण की गई थी।

- सामवेद को भारतीय संगीत का उद्गम माना जाता हैं। यज्ञ के अवसर पर जिस देवता के लिए होम किया जाता थाए उसे बुलाने के लिए उद्गाता उचित स्वर में उस देवता का स्तुति.मन्त्र गाता था।

- सामवेद का प्रथम दृष्टा वेद व्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता हैं।

अथर्ववेद

ऐतिहासिक महत्ता की दृष्टि से चारों वेदों में अथर्ववेद सबसे प्रमुख हैं, जिसकी रचना सबसे अंत में हुई थी। इसमें तत्कालिक आम जीवन का चित्रण देखने को मिलता हैं।

अथर्ववेद का यज्ञों से बहुत कम सम्बन्ध है। इसमें आयुर्वेद सम्बन्धी सामग्री अधिक है। इसका प्रतिपाद्य विषय विभिन्न प्रकार की ओषधियाँए ज्वरए पीलियाए सर्पदंशए विष.प्रभाव को दूर करने के मन्त्र सूर्य की स्वास्थ्य.शक्तिए रोगोत्पादक कीटाणुओ के शमन अदि का वर्णन है इस वेद में यज्ञ करने के लाभ को तथा यज्ञ से पर्यावरण की रक्षा का भी वर्णन है। वे इसमें आर्य और अनार्य धार्मिक विचारों का सम्मिश्रण देखते हैंए किन्तु वस्तुतः इसमें राजनीति तथा समाज.शास्त्र के अनेक ऊँचे सिद्धान्त हैं।

इसमें रोग-निदान, राजभक्ति, विवाह, प्रणयगीत, जादू टोना और अंधविश्वास आदि विविध विषयों का विवरण भी मिलता हैं।

- अथर्ववेद का विभाजन मंडलों में होकर कांडो में हैं। इसे अथर्वांगिरस वेद भी कहा जाता हैं। क्योंकि अथर्वा ऋषि इसके प्रथम अंगिरस द्वितीय दृष्टा थे। इसमें कुल 20 कांड, 731 सूक्त, 5987 मंत्र हैं। (1200 मंत्र ऋग्वेद के हैं)