मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

जिया कब तक  उलझेगा  ,संसार विकल्पों में
कितने भव बीत गये ,संकल्प विकल्पों में


ऊड ऊड के ये चेतन गति गति में भटकता हैं
भोगो में लिप्त सदा भव भव दुःख पाता
निज तो न सुहाता हैं पर ही मन भाता हैं
ये जीवन बीत रहा संसार विकल्पों में


तू कोण कहाँ का हैं और क्या हैं नाम तेरा
आया किस घर से हैं और जाना किस गावं अरे
अन्तेर मुख हो जाता तो सुख अविकल्पो में
ये  तन   तो पुद्गल  हैं  दो  दिन  का ठाट  अरे
                     जिया कब तक..........
यदि अवसर चूका तो  भव भव पछतायेगा
ये नर भव कठिन महा किस गति में पायेगा 
नर भव भी पाया तो जिन कुल नहीं पायेगा
अनगिनत जन्मो में अनगिनत विकल्पों में