बुधवार, 15 मार्च 2023

भारतीय संगीत: मुगलकाल

 

भारतीय संगीत: मुगलकाल

 

बाबर; हुमायूँ की तरह अकबर को भी संगीत का काफी शौक था। अकबर का काल संगीत की दृष्टि से सर्वोतम था। अकबर स्वयं नगाड़ा बजाता था।

अकबर के नवरत्नो में से एक तानसेन (मूल नाम रामतनु पाण्डेय)उस समय का महान संगीतकार था। वह ग्वालियर का था।उसने राजा मानसिंह (तोमर) द्वारा स्थापित ग्वालियर के संगीत विद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी, उसके गुरु वृंदावन के हरिदास थे। तानसेन ने मानसिंह की विधवा मृगनयनी से भी शिक्षा ग्रहण की थी। अबुल फजल ने तानसेन के बारे में कहा था" उस जैसा गायक हजारों वर्षों में कोई नहीं हुआ था।" 'मुगल दरबार में आने से पूर्व तानसेन रीवा के शासक रामचंद्र देव के दरबार में था। अकबर ने उसे 'कण्ठाभरण वाणीविलास' की उपाधि दी थी। शेख सलीम चिश्ती भी तानसेन के प्रशंसक थे।

तानसेन का मकबरा  मौहम्मद  गौस  के मकबरें के पास  ग्वालियर में है। उसकी  मृत्युः आगरा में हूई थी।

(Note - मानसिंह तोमर ने धुपद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इस समय धुपद गायन शैली और बीन (वीणा) वादन का प्रचार था। ख्याल शैली का अभी आविष्कार नहीं हुआ था।

 बैज बख्श, गोपाल, हरिदास, सूरदास, रामदास अन्य धुपद गायक थे।

तानसेन का पुत्र तानतरंग खा भी संगीतज्ञ था।

 

अबुल फजल के अनुसार सोलहवी सदी में शुजातखाँ का पुत्र बायजीद (बाज बहादुर) एक कुशल संगीतज्ञ था, जिसे 1571 0 में अकबर ने अपने दरबार में बुलाकर दो हजारी मनसबदार बनाया था।

 अकबर एक बार तानसेन के गुरू हरिदास (कुछ के अनुसार ये दोनों मानसिंह के शिष्य थे) का गाना सुनने उनकी कुटिया में गया था, क्योंकि उन्होंने दरबार में आने से मना कर दिया था

- सूरदास का दरबार से अप्रत्यक्ष संबंध था। बैजू बावरा भी तानसेन का समकालीन था  परन्तु वह दरबार से संबंधित नहीं था।

 जहाँगीर भी संगीत प्रेमी था। तानसेन के छोटा विलासखाँ, छतरखाँ, हमजान परवेजदाद आदि उसके दरबार के प्रमुख कलाकार थे।

कहा जाता है कि शौकी नामक एक गजलकार को जहाँगीर ने आनंदखाँ की उपाधि दी थी।

 शाहजहाँ भी संगीत का रसिक था। उसने विलास खां के दामाद लालखाँ को गुणसमंदर की उपाधि से विभूषित किया था। जगन्नाथ, रामदास, सुखसेन सूरसेन, लाल खाँ, दुरंग खाँ आदि उसके  दरबार के प्रमुख गायक थे।

यद्यपि औरंगजेब ने संगीतकारों को कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया था तथापि उसके आश्रय में गायकों और वादकों को दरबारी स्थान प्राप्त था।

 लेकिन बाद में औरंगजेब ने दरबार में संगीत बंद करवा दिया ।इसके विरोध में जब कुछ संगीतज्ञों ने तबले तानपुरे के रूप में संगीत का जनाजा निकाला तो सम्राट ने कहा कि इनकी कब्र इतनी गहरी बनाना ताकि आवाज आसानी से बाहर नहीं सके।

फिर भी सरदारों और सम्राट के हरम में संगीतप्रेम समाप्त नहीं हुआ।

 

 जौनपुर के  हुसैन शाह शर्की ने ख्याल गायकी की रचना की थी मुहम्मद शाह रंगीला के काल मे नेमत खां सदारंग और उनके भतीजे अदारंग ने ख्याल गायकी का काफी विकास किया।

18वीं सदी में ख्यात गायकी के साथ साथ सितार नामक वाद्य यंत्र का विकास हुआ जिसका आविष्कार इस सदी के खुसरों खां ने किया था।

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