बुधवार, 15 मार्च 2023

हुमायूँ का मकबरा

 इस भवन के आयोजन को अकबर का समर्थन प्राप्त था, लेकिन इसका निर्माण हुमायूँ की बेगम हाजी बेगम (हमीदा बानू बेगम) की देखरेख में हुआ था, जो हुमायूँ के निर्वासन काल में उसके साथ फारस (ईरान) गई थी और उसने फारसी वास्तुकला को आत्मसात कर दिया था।


हुमायूँ के  मकबरे में इस फारसी कला को भारतीय परिस्थिति में अंतरित किया गया था।

हुमायूँ का मकबरा पहले के मकबरों की भाँति भूमि के बंजर टुकड़े पर नहीं खड़ा है। इसके चारों ओर एक चार बाग की रचना की गई है। इस तरह से हुमायूँ का मकबरा भारत  में  चार बाग पद्धति मे बना प्रथम स्थापत्य स्मारक है। [ वैसे भारत में पहला बाग युक्त मकबरा सिकंदर लोदी का मकबरा है ]

 

( NOTE :चारबाग ज्यामितीय चतुर्भुजाकार आकार का उद्या है, जिसकों चार चतुर्भुजों में विभाजित किया जाता है)।चार बाग का वर्णन फारसी काव्य में मिलता है। मकबरे के चारों तरफ बनी पानी की चार नहरें बिहश्त की चार नदियों का संकेत करती है। इस उद्यान के बीच में खड़ा मकबरा बिहस्त के भवन का रूप है। इमारत के प्रमुख कक्ष से बहती हुई पानी की नालियां बनाई गई है, जिनके बीच में फटवारे लगे हैं।)

इस मकबरे का खाका हाजी बेगम के प्रमुख वास्तुकार 'मीराकमिर्जा गियास' ने बनाया था। वे ईरान (फारस) के रहने वाले थे। यह मकबरा भारत में फारसी अवधारणा के आत्मसातीकरण का प्रतीक है। यहां पर हिन्दु वास्तुकला की पंचरथ शैली की प्रेरणा भी कुछ हद तक देखी जा सकती है।

पूरी इमारत लाल बलुए पत्थर से बनी है। और इस पर विपरीत रंग के सफेद संगमरमर से नक्काशी की गई है।

यह आकार में अष्टभुजीय हैं और एक ऊंचे गुम्बद से आच्छादित हैं, जो वस्तुतः दोहरा गुम्बद है। यह मकबरा दोहरे गुम्बद वाला भारत का पहला मकबरा है। यह गुम्बद सफेद संगमरमर का बना है। इस गुम्बद को लम्बी गरदन वाला गुम्बद भी कहते हैं।

मकबरे की प्राचीर के छज्जे और छतरियाँ शुद्ध भारतीय शैली की है। इस प्रकार इस पूरे परिसर में फारसी और भारतीय परम्पराओ का मिश्रण दिखाई देता है।

. मकबरे का निर्माण कार्य 1565 . में शुरू हुआ था और 8 वर्ष में पूर्ण हुआ। इस मकबरे को ताजमहल का पूर्वगामी माना जाता है।

 यह वह मकबरा है, जिसमे मुगल वंश के सर्वाधिक लोगों को दफनाया गया है, ये थे-

हुमाूँ, बेगा बेगम, हमीदा बानू बेगम, हुमायूँ की छोटी बेगम, दाराशिकोह, जहांदरशाह, फरूखसियर, रफीउरदरजात, रफी उद्दौला, आलमगीर द्वितीय।

 बहादुरशाह जफर और उसके तीन शाहजादों को अंग्रेज ले० हडसन ने 1857 में हुमायूँ के मकबरे में ही गिरफ्तार किया था।

हुमायूँ के मकबरे में जिस फारसी शैली को अपनाया गया था, अकबर के काल में इस शैली का हिन्दू और बौद्ध परम्पराओं से और अधिक मिश्रण हुआ।

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