गुरुवार, 16 मार्च 2023

पालना झूलाने वाले हाथों में ही संसार की बागडोर होती है

 

पालना झुलाने वाले हाथ व्यक्ति के चरित्र निर्माण की महत्वपूर्ण कड़ी होते है। हम बचपन में शिवाजी का उदाहरण पढ़ते थे जिसमें बताया जाता था कि उनकी मां ने उनमें अत्याचार का सामना करने और देशभक्ति की भावना बचपन में भर दी थी। हमारे देश के युवाओं के दिलों की प्रेरणा एवं आदर्श एपीजे अब्दुल कलाम के चरित्र निर्माण में भी उनकी माँ का बहुत बड़ा योगदान था। वास्तव में पालना झुलान वाले हाथों में ही संसार की बागडोर होती है। इन लोगों से प्राप्त शिक्षा, संस्कार और मूल्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण कर संसार की दिशा तय करते हैं।

वर्तमान समय में बदलती जीवन प्रणाली से कुछ हद तक पालना झूलाने वाले हाथों से संसार की बागडोर फिसलने  भी लगी है क्योंकि भौतिकता वादी दौड़ में समय का अभाव लोगों पर हावी होता जा रहा है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में पारिवारिक प्रभाव की भूमिका कुछ हद तक धूमिल सी होने लगी है। हमें इस संदर्भ में अपनी पूर्व परंपराओं पर पुनः नजर डालनी होगी जिससे हम पालना झूलाने वाले हाथों को इस तरह से संस्कारित कर सके कि वे एक खुशहाल विश्व को बनाने के लिए संसार की बागडोर थाम सके।

व्यक्ति में मूल्य विकसित करने में पालक माता-पिता और निकट  संबंधियों के मूल्यों का विशेष योगदान रहता है। अकबर ने जिस 'सुलह ए कुल' की नीति के द्वारा भारतीय इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करवाया उसके पीछे पारिवारिक उदारता का माहौल जिम्मेदार था। अकबर के पिता हुमायूँ सुन्नी थे, लेकिन राज्य कीआवश्यकता को देखकर शिया धर्म भी अपना लिया था। अकबर की माँ भी शिया थी। अकबर का जन्म सूफी संत सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से हुआ, तो इस तरह सूफीयत की उदार  परम्परा का सानिध्य भी उसे बचपन से ही मिल गया। अकबर के गुरु अब्दुल लतीफ इतने उदार व्यक्ति थे कि उन्हें शिया लोग सुन्नी और सुन्नी लोग शिया मानते थे।

इस तरह स्पष्ट है कि अकबर को जो संस्कार अपने पालको से प्राप्त हुए उन्होंने अकबर के चरित्र को प्रभावित कर उसके द्वारा उन कार्यो को अंजाम दिलाया जिन्होंने पूरे मध्यकाल की राजनीति को प्रभावित किया और आज भी प्रशासकों हेतु  प्रेरणा स्रोत है। इस तरह सहिष्णुता की नीति का आधार बन उन लोगों ने संसार की शासन प्रणाली को दिशा प्रदान की थी।

कभी मानसिक रूप से विकलांग घोषित किए गए  अलबर्ट आइंस्टीन की वैज्ञानिक उपलब्धियों और योगदान की आज पूरी दुनिया कायल है। उनकी माँ ने ही उनके व्यक्तित्व को एक ऐसा मोड़  दिया कि वे संगीत की दुनिया से होते हुए आविष्कारकों की दुनिया में पहुंच गए।

 

वास्तव में पालन पोषण करने वाले लोगों के पास किसी बच्चे के चरित्र निर्माण करने का महान अवसर होता है। उस समय बच्चों का मस्तिष्क एक कोरा कागज की तरह होता है, उसको जिस तरह से ढालना चाहो ढाला  जा सकता है। चूंकि मानव की शक्ति का कोई पारावार नहीं है, अत: पालक अपने बच्चों में  जितने उच्च आदर्शों को भरते है बच्चे उसी के अनुरूप अपनी जिंदगी को बनाने लगते है। इस संदर्भ में चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य का उदाहरण भी उल्लेखनीय है।

चाणक्य ने जंगल से 'राजकीलम' नामक खेल खेल रहे एक बालक को शिकारी से खरीदा। उसे तक्षशिला ले जाकर चाणक्य ने उसे हर तरह से तैयार कर दिया ।वह बालक मौर्य साम्राज्य का संस्थापक तो बना ही साथ ही उस बालक ने विश्व इतिहास में पहली बार जनता की सहायता से अपने देश को विदेशी सत्ता से  मुक्त भी करवा दिया।

इन उदाहरणों मे हमने अब तक सकारात्मक  पहलुओं को देखा। पालक माता पिता  के योगदान का  नकारात्मक आयाम भी   है।  एक बहुत बड़े चोर की कहानी कई लोगों ने बचपन  में  सुन रखी है।   वह बच्चा जब पहली बार स्कूल से पेंसिल चुरा कर लाया  था तब माँ के द्वारा दी गई शाबासी से उसका मनोबल इतना बढ़ गया कि वह देश का सबसे बड़ा चोर बन गया था।

इस तरह स्पष्ट है कि पालना झूलाने वाले हाथों में ही विश्व की बागडोर है। ये ही वे हाथ है जो मानव को  महामानव बना सकते हैं और दानव  भी बना सकते है। लेकिन जैसे कि  हमने पहले देखा कि वर्तमान समय की बदलती परिस्थितियों में पारिवारिक स्तर पर मूल्य निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होती जा रही है। संयुक्त परिवार के विघटन से दादा-दादी की कहानियों के माध्यम से जो व्यक्तित्व निर्माण हो सकता था  वह परंपरा कमजोर हो गई। ऊपर से कामकाजी जीवन प्रणाली और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रचलन के कारण माता-पिता के पास भी अब अपने बच्चों के लिए विशेष समय नहीं है। यहां तक कि जो काम माता-पिता का होता था वह कार्टून जगत के जिम्मे आ गया है। कार्टून को देखते-देखते बच्चे फिल्म जगत की तरफ बढ़ रहे है और फिल्म जगत का नकारात्मक पहलू सकारात्मक पहलू से ज्यादा हावी होता नजर आ रहा है।

स्वयं माता पिता और पारिवारिक जनों के मूल्य तंत्रों के कमजोर हो जाने से भी वे हाथ अब बच्चों का चरित्र  निर्माण उस तरह से नहीं कर पा रहे है जैसा कि पहले होता था। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि यह परम्परा पूरी तरह से खत्म हो गई हो।  आज भी कई प्रभावी हस्तियाँ विश्व जगत को खुशहाल बनाने में सहयोग कर रही है और उनके चरित्र निर्माण में उनके पालकों का बहुत ही बड़ा योगदान रहा है।

 विश्व में  बढ़ती भौतिकतावादी चकाचौंध के इस दौर में पारिवारिक संस्कार व्यक्ति के चरित्र में आगे भी प्रभावी भूमिका निभाते रहे इस हेतु हमें पारिवारिक जनों के मूल्य तंत्र को मजबूत बनाना होगा । हमे उन परंपराओं को फिर से विकसित करना होगा जिनसे पालना झूलाने वाले हाथों में ही विश्व की सत्ता की बागडोर बनी रहे और वे सकारात्मक आयामों को विकसित कर विश्व को खुशहाल बनाने में सहयोग करते रहे

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