बुधवार, 15 मार्च 2023

मुगल चित्रकला

मुगल चित्रकला

 मुगल काल से एक विशिष्ट कला शैली के रूप में चित्रकला को शुरू करने का श्रेय हुमायूँ को है। मुगलकालीन चित्रकला फारस और भारत  की चित्रकला का मिश्रित रूप थी।

भारत से निर्वासन काल में हुमायूँ ने ईरान में हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार बिहजाद के दो शिष्यों मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद की सेवा प्राप्त की थी। इन दोनों कलाकारों ने हुमायूँ की अस्थायी राजधानी काबुल में काम करना शुरू कर दिया था। बालक अकबर ने यही इनसे चित्रकारी सीखी थी।

यहा एक अन्य चित्रकार दोस्त मुहम्मद भी उसकी सेवा में था।

 मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद हुमायूँ के साथ भारत गए थे और अकबर के काल में भी इन्होंने कार्य किया था। (NOTE - हुमायूँ ने अब्दुल समद को शीरीकलम की उपाधि दी थी)

चित्रकला के क्षेत्र में हुमायूँ के काल की प्रमुख देन थी। तैमूर घराने के राजकुमारनामक चित्र, जिसे 1550 में कपड़े पर बनाया गया था, जो 1.5 वर्ग मीटर लम्बा है। इसे मंगोल परम्परा की देन बताया जाता है। ईरान में इतने बड़े चित्र नहीं 'बनाए जाते हैं।

अकबर के काल में चित्रकला

अकबर ने चित्रकला को विशेष प्रोत्साहन दिया था। उसने अब्दुसमद (संभवत: मीर सैयद अली भी) के नेतृत्व में चित्रकला के एक पृथक विभाग की स्थापना की थी। चित्रकारों के कार्य करने के स्थान को तस्वीरखाना कहा जाता था।

अबुल फजल ने सिर्फ 17 कलाकारों के नामों का ही उल्लेख किया है। कलाकारों में हिन्दुओं की संख्या सर्वाधिक थी। इनमें पालकी ढोने वाले एक कहार का बेटा दसवंत भी शामिल था। कलाकारों को नकद वेतन प्रदान किया जाता था।

मुगल चित्रशाला की पहली अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति दास्ताने अमीर हज्मा (हज्मनामा )थी। इसमें करीब 1200 चित्र थे। सभी चित्र स्थूल और चमकीले रंग के कपड़े ( लिनन) पर चित्रित थे। लेकिन इस संपूर्ण कृति का बहुत छोटा अंश ही उपलब्ध है।

 

फारसी नायक हमीर हज्मा(हजरत मुहम्मद के चाचा) के वीरतापूर्ण कारनामों से संबंधित अर्द्ध पौराणिक फतांसियों से अकबर को काफी लगाव था। इसीलिए वह इस विशालकाय चित्रकथा की जिल्द को जनानखाने में रखता था। इसके निर्माण में पहले सैयद अली और बाद में अब्दुस्समद के नेतृत्व में कलाकारों की 15वर्ष लगे।

अकबर के काल में ही आशिका, अनवारे सुहाइली' और तूतीनामा और राशिचक्रीय ' जैसी मुख्य पांडुलिपियों का भी चित्रांकन हुआ था।

 आइने अकबरी में वर्णित प्रमुख चित्रकार थे- दसवंत, बसावन, केशव, मुकुंद मिशकिन, फारूख, कलमक, माधू, लाल, जगन, महेश, खेमकरण, तारा, हरिवेश और राम।

दसवंत के चित्र राज्मनामा पांडुलिपि में मिलते है। तूतीनामा और खानदाने तैमूरिया भी उसकी रचनाएं मानी जाती है। (रज्मनामा महाभारत का फारसी अनुवाद)

बसावन :- चित्रकला की सभी शाखाओं में- रेखांकन, रंगप्रयोग, छवि चित्रकारी, भृदृश्यों का चित्रण आदि में  सिद्धहस्त था।

कृशकाय घोड़े के साथ मजनूं को उजाड़ क्षेत्र में  भटकते दिखाने वाला चित्र उसने ही बनाया था।

अकबर कालीन प्रारंभिक कला पर ईरानी प्रभाव था, लेकिन बाद के काल में ईरानी और भारतीय शैली का समन्वय हो गया था। पुर्तगालियों के प्रभाव से उसके दरबार में यूरोपीय चित्रकला भी प्रारंभ हुई थी।

 

सलीम कालीन चित्रकला

अकबर के शासन काल के अंतिम वर्षों में मुगल चित्रकला शैली में तेजी से परिवर्तन आया जिसका कारण था शाहजादा सलीम द्वारा आका रिजा नाम के एक हेराती प्रवासी के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रशाला की शुरूआत करना।

जहाँगीरकालीन चित्रकला

जहाँगीर ने अपने शाहजादा काल में चित्रकला की जो परम्परा शुरू की थी, वह पादशाह बनने पर भी जारी रही। पहले चित्रकारी हस्त लिखित ग्रंथ की विषय वस्तु से संबंधित होती थी। जहाँगीर ने इसे इस बंधन से मुक्त कर दिया।

उसकी रुचि छवि चित्रों की तरफ काफी बढ गई थी, अतः उसने शाही परिवार के अलावा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशिष्ट व्यक्तियों के छवि चित्र बनवाएं थे

उसने अग्रणी चित्रकार बिशनदास को फारस के शाह के, उसके अमीरों के तथा उसके परिजनों के  छवि चित्र बनाने के लिए भेजा था। (NOTE - वैसे तो छवि चित्र अकबर के काल में ही बनने शुरू हो गए थे।)

जहाँगीर के काल में प्रारंभ में मनोहर, नन्हा, फारूख बेग को छवि चित्र बनाने का काम सौंपा गया था, परन्तु बाद में दौलत, अबुल हसन, मनोहर और विशनदास ने अधिकतर एकल और सामूहिक छवि चित्रों का निर्माण किया था।

जहाँगीर के आदेश पर ताज पेशी, होली, 'आबपाशी' जैसे त्योहारों तथा जन्मदिन पर तुलादान आदि अवसरों पर लगाए गए विशेष दरबारों और सभाओं के उल्लासपूर्ण चित्र बनाए गए। इसके अलावा बाजपालन और आखेटन के चित्र भी बनाए गए थे।

 जहाँगीर के उत्तरवर्ती काल में अबुल हसन, विचित्र, हशीम आदि ने भव्य लघुचित्र बनाएं थे। एक चित्र में उसे ईरान के शाह अब्बास का स्वागत करते और उसे गले लगाते हुए दिखाया गया है, जबकि वह कभी उससे मिला ही नहीं था। एक चित्र में उसे मलिक अंबर के कटे सिर पर लात मारते दिखाया गया है, जबकि वह कभी उसे हरा ही नहीं पाया था।

 जहाँगीर के चित्रकारों में फारूख बेग, दौलत, मनोहर, बिशनदास, मंसूर और अबुल हसन प्रमुख थे। (अबुल हसन को छोड़ बाकी ने अकबर के काल में भी कार्य किया था ) | मनोहर बसावन का पुत्र था।

NOTE : जहाँगीर चित्रको देख उसके बनाने वाले का नाम बता सकता था और सामूहिक रूप से बनाए चित्र में कौन सा भाग किस चित्रकार ने बनाया था, यह बता सकता था।

जहाँगीर ने उस्ताद मंसूर को नादिर उल अस्र  'और अबुल हसन को नादिरुज्जमात  की उपाधि दी थी।

- उस्ताद मंसूर को प्राकृतिक इतिहास, दुर्लभ पशुओं पक्षियों फलों के चित्रण में महारत हासिल थी। इसके द्वारा चित्रित चित्रों में दो प्रमुख हैं (1) साइबेरियन सारस का चित्र (2) बंगाल का एक विशेष पुष्प

अबुल हसन ने 1600 ई० में संत जॉन की तस्वीर बनाई थी। उसे लघुचित्रों की सभी शाखाओं में महारत थी, लेकिन रंग योजना में विशेष महारत हासिल थी।

 चिनार के एक पेड़ पर गिलहरियों को हर संभावित मुद्रा में चित्रित किया गया है। 'इसे अबुल हसन की रचना माना जाता है। पर इसे मंसूर उसकी संयुक्त रचना भी  माना जाता है।

जहाँगीर के काल में मुगल कला फारसी प्रभाव से मुक्त हो गई थी।

NOTE - इस काल में मंसूर ने पशुपक्षी फूलों के चित्रांकन में उत्कृष्टता हासिल की थी। अबुल हसन और बिशनदास ने शाही प्रतिकृतियों के निर्माण में और गोवर्धन ने धार्मिक व्यक्तियों और संगीतज्ञों के चित्रांकन में महारत हासिल की थी।

 जहाँगीर के समय में अनेक यूरोपीय धार्मिक विषयों और प्रतीकों को अपनाया गया था।  जिनमें अबुल हसन ऐसा करने वाला प्रमुख चित्रकार था।

 

जहाँगीर के बाद की चित्रकला

जहाँगीर के बाद चित्रकला के विकास ने जड़ता को प्राप्त कर लिया था। शाहजहाँ की मुख्य रूचि स्थापत्य में ही थी। शाहजहाँ को दैवी संरक्षण में अपनी तस्वीरें बनवाना प्रिय था। जैसे उसका गुणगान करते हुए ताज लेकर देवदूतों का आगमन सामान्यतः छविचित्र बनाने की प्रथा शाहजहाँ के शासनकाल में अपने पूर्ववर्तियों की अपेक्षा अधिक प्रचलित थी।

शाहजहाँ की चित्रशाला में जो चित्र तैयार हुए, उनमें आवश्यकता से अधिक अलंकरण और रंगों का उपयोग हुआ है। रंगों की संतुलित मिलावट के बजाय भडकीले रंगों का प्रयोग तथा सोने का प्रचुर प्रयोग होता था। इससे चित्रों की जीवंतता और ताजगी में कमी आई।

औरंगजेब की रूढिवादिता के कारण संगीत की तरह चित्रकला का भी पतन हुआ। अतः चित्रकारों ने नए आश्रयदाताओं की तरफ रुख किया जिससे नई-नहीं प्रांतीय चित्रकला शैलीयों का विकास हुआ।

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