बुधवार, 15 मार्च 2023

मुगलकाल में भाषा और साहित्य

 मुगलकाल में भाषा और साहित्य

 

मुगल काल में  जहां शासन की भाषाओं के रूप में संस्कृत और फारसी का महत्व था, वहीं भक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय भाषाओं का भी विकास हुआ था और इसके विकास में क्षेत्रीय राजाओं के संरक्षण ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

अकबर के शासन काल तक फारसी का ज्ञान इतना फैल चुका था कि अब राजस्व के दस्तावेज फारसी के साथ-साथ स्थानीय भाषा (हिंदवी) में भी रखने की जरूरत खत्म हो गई। लेकिन दक्कनी राज्यों में यह रिवाज सत्रहवी सदी में उनके अवसान तक जारी रहा।

फारसी साहित्य

 

अकबर के शासनकाल में फारसी कविता और गद्य अपने चरमोत्कर्ष पर थे। अकबर ने फारसी को राजभाषा बनाया था और संस्कृत, अरबी, तुर्की, यूनानी आदि भाषाओं की श्रेष्ठ पुस्तकों का अनुवाद करने के लिए एक अनुवाद विभाग स्थापित भी किया था।

अबुल फजल उसके काल का एक महान विद्वान, शैलीकार और इतिहासकार था। उसने गद्य लेखन की जिस शैली का प्रचलन किया था उसका अनुकरण बाद की पीढियों के लेखकों द्वारा भी किया जाता रहा। अबुल फजल की रचनाओं मे 'अकबरनामाका मुगलकाल के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण स्थान है।  7 साल की मेहनत के बाद पूर्ण यह कृति तीन जिल्दों में है ।जिसकी तीसरी जिल्द 'आइने  अकबरी' के नाम से प्रसिद्ध है। पहली जिल्द में सृष्टि की रचना से लेकर 1572 .तक के इतिहास का वर्णन है, दूसरी जिल्द में ' अकबर की गद्दीनशीनी से 46 वे वर्ष तक का वर्णन है। आईने अकबरी से शासन प्रणाली और तत्कालिक भारत के विविध पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है।

अबुल फजल का भाई फैजी इस युग का प्रमुख कवि था। वह अकबर के अनुवाद विभाग मे भी हाथ बंटाता था।

उत्बी और नजीरी दो अन्य प्रमुख कवि थे यद्यपि इनका जन्म फारस में "हुआ था तथापि वे इस काल में भारत को आने वाले उन बहुत से कवियों और विद्वानों में शामिल थे. जिनके कारण मुगल दरबार इस्लामी दुनिया का सांस्कृतिक केंद्र बन गया था।

"अकबरकालीन यह पद्यकारों में' 'गजा' का भी महत्वपूर्ण स्थान था।

 

अकबरकालीन फारसी अनुवाद कार्य

 

अकबर ने फैजी के अधीन एक अनुवाद विभाग की स्थापना की थी। इस विभाग द्वारा किए गए विभिन्न अनुवादों में महाभारत का फारसी अनुवाद 'रज्मनामा सबसे महत्वपूर्ण है। यह यह अनुवाद नक्कीब खाँ, बदायूँनी, अबुल फजल फैजी आदि के संयुक्त प्रयास से किया गया था। बदायूँनी ने रामायण का अनुवाद किया था। उसने अथर्ववेद का अनुवाद भी प्रारंभ  किया था, लेकिन इसे पूरा हाजी इब्राहिम सरहिंदी ने किया। राजा टोडरमल ने भागवत पुराण का, फैजी ने गणित की पुस्तक लीलावती

और नल दमयंतीका, मुकम्मलखाँ गुजराती ने ज्यातिष शास्त्र की एक पुस्तक (तजक) 'का हाँ -जफर' नाम से फारसी भाषा मे अनुवाद किया था।

अब्दुर्रहीम खानखाना एवं पायदाखां ने अलग-अलग तुजुके -बाबरी का फारसी अनुबाद किया था।

"अबुल फजल ने कालियादमन' का अयारे दानिश' नाम से अनुवाद किया। 'मौलाना शाह मुहम्मद शाहावादी ने राजतरंगिणी' का और मौलाना शेरी ने 'हरिवंश का अनुवाद किया।

'सिंहासन बत्तीसी' का भी अनुवाद किया गया। पंचतंत्र का अनुवाद कलीला वा दीमना नाम से किया गया। संभवत: अकबर के काल में ही कुरान का भी पहली बार अनुवाद किया गया था।

जहाँगीर भी साहित्य में रुचि रखने वाला शासक था, परन्तु उसके काल में अनुवाद का कोई विशेष कार्य नहीं हुआ। बाद के शासकों के काल में भी साहित्य का सृजन चलता रहा। साहित्यिक रचनाओं के अतिरिक्त मुगलकाल में ऐतिहासिक ग्रंथों और कोशों की भी रचना की गई।

मुगलकाल में फारसी इतिहास लेखन

मुगलकाल में फारसी भाषा में अनेक ऐतिहासिक कृतियों की रचना की गई। इस काल ग्रंथों पर व्यक्तिगत विचारों और भावनाओं की छाप बड़ी स्पष्ट दिखाई देती है। और धार्मिक शब्दावली का भरपूर प्रयोग किया गया है।

इस काल में इतिहास लेखन अपने चरम पर पहुँच गया था

क्योंकि मुगल बादशाह इतिहास में बहुत ज्यादा रुचि लेते थे। इस काल की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता ने भी इतिहास लेखन की प्रकृति को बढ़ावा दिया था। हम काल की कुछ प्रमुख ऐतिहासिक कृतियां इस प्रकार की -

 

1.       तारीखे रसीदी :मिर्ज़ा हैदर दुगलत (बाबर का मौसेरा भाई) - मध्य एशिया के तुर्कों और मुगलों के आरंभिक इतिहास का विवरण

2.        कानूने हुमायूँनी - खोंदमीर- हुमायूँ का समसामयिक ग्रंथ

(3) हुमायूँनामा गुलबदन बेगम (हुमायूँ की बहन) - अकबर के कहने पर यह रचना लिखी गई थी।

4) तज़किरातुल वाकयात - जौहर आफताबची (हुमायूँ का पुराना नौकर)- अकबर के कहने पर रचना।

(5) ) वाकयात मुश्ताकी :रिजाकुल्ला मुश्ताकी - बहलोल लोदी से लेकर अकबर के शासनकाल के मध्य तक विवरण (लोदी और सूरकाल पर प्रकाश डालने वालीपहली पुस्तक) (6) तोहफा अकबरशाही (तारीख शेरशाही- अबासखान सरवानी की )रचना अकबर के आदेश पर की गई थी। इस ग्रंथ में शेरशाह के शासन का विस्तृत विवरण मिलता है 'वर्तमान में इतिहासकार इस पुस्तक को आधार बनाते है।

(7) तारीख -शाही/ तारीख -सलातीन--अफगानी अहमद यादगार) - बहलोल लोदी से लेकर हेमू के समय तक का अफगान इतिहास

(8) तजकिरा -हुमायूँअकबर: बायजीद बयात

(9) नफाइस उल मासिर (मीर अलाउद्दौला कजवीनी) : संभवत: यह अकबर के काल पर प्रथम ऐतिहासिक किताब थी। यह किताब कवियों की जीवनी पर आधारित है।

(10) तारीख अकबरी आरिफ कंधारी

(11) तारीख अलफी - इस्लाम के एक हजार साल पूरे होने पर अकबर ने इस इतिहास को लिखने का आदेश दिया था। इस कार्य हेतु सात विद्वानों का एक बोर्ड बनाया गया था। यह मुस्लिम शासकों का साधारण इतिहास हैं, जो पैगम्बर मुहमद की मृत्यु के बाद से शुरू होता है।....

 (13) तबकात अकबरी (निजामुद्दीन अहमद)

(14) मुन्तखब उत तवारीख (अब्दुल कादिर बदायूँनी ) - यह अकबर के काल की एकमात्र रचना हैं, जो अकबर को समर्पित नहीं है। इससे बदायूँनी द्वारा अकबर की काफी आलोचना की गई है। इस रचना में अकबरकालीन सूफियों, कवियों उलेमाओं और चिकित्सको की जीवनी का भी उल्लेख है।

 

(15) तुजुक -जहाँगीरी : जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा' तुजुके जहाँगीरी' में शासनकाल के 17 वें वर्ष तक का विवरण स्वयं लिखा उसके बाद मौतमिदखाँ को यह कार्य सौंपा गया किन्तु अंतिम रूप से इस पुस्तक को मुहम्मद हाजी ने पूरा किया।

मोतमीद खाँ ने 'इकबालनाम जहाँगीरी' की भी रचना की थी।

15. मुहम्मद कासिम फरिश्ता: तारीखे फरिश्ता मकज्जम अफगानी( नियामतुल्ला) ।जहाँगीर के काल में ही लिखी गई

 (16) पादशाहानामा, मोहम्मद अहमद कजवीनी का पादशाहनामा शाहजहाँ के शासनकाल का सबसे पहला सरकारी इतिहास है, जिसमें शाहजहाँ के शासनकाल के प्रथम दस वर्षो का इतिहास है।

शाहजहां के काल में उसके दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने भी पादशाहनामा की रचना की थी लेकिन उससे पहले एक और इतिहासकार मुहम्मद सादिक ने भी पादशाहनामा की रचना की।

नायतखाँ का शाहजहाँनामा और मुहम्मद सालेह का 'आलमे साहेल भी शाहजहाँ कालीन प्रमुख इतिहास ग्रंथ है।

(17) औरंगजेब अपने साम्राज्य में इतिहास लेखन के विरुद्ध था, इसीलिए खाफीखाँ को मुन्तखब उल लुबाब  (औरंगजेब के शासन काल का आलोचनात्मक विवरण) की रचना गुप्त रूप से करनी पड़ी थीं। फिर भी औरंगजेब के शासनकाल में फारसी भाषा में अनेक ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी गई। इनमें मुहम्मद काजिम का 'आलमगीरनामा, मुहम्मद साकी का 'मआसिरे आलमगिरि, सुजानराय भंडारी का खुलासत उत तवारीख, ईश्वरदास का  फुतुहाते आलमगीरी और भीमसेन बुराहनपुरी का 'नुक्शा दिलकुशा' प्रमुख हैं।

 

ओरंगजेब के 'शासनकाल में मुहम्मद साकी द्वारा रचित ' मआसिरे आलमगिरी' को  जदुनाथ सरकार ने मुगलराज्य का गजेटियर' कहा है।

(औरंगजेब ने अनेक अरबी ग्रंथों की सहायता से फारसी में एक न्याय और कानून की पुस्तक 'फतवा आलमगिरी' का संकलन करवाया था। इसे भारत में रचित मुस्लिम कानून का सबसे बड़ा डायजेस्ट  माना गया है।

 

NOTE 1. औरंगजेब ने सरकारी तौर पर इतिहास लेखन पर पाबंदी लगवा दी थी फिर भी औरंगजेब के समय के सबसे ज्यादा इतिहास ग्रंथ प्राप्त होते हैं।

2. शाहजहाँ के शासनकाल में चन्द्रभान ब्राह्मण ने चहार चमनकी रचना की थी।

 

संस्कृत साहित्य

यद्यपि इस युग में श्रेष्ठ मौलिक संस्कृत रचनाओं का अभाव था, परन्तु फिर भी संस्कृत भाषा की स्थिति सल्तनतकाल से अच्छी थी।

अकबर ने शासनकाल में जैन विद्वान पद्मशंकर ने सर्वप्रथम फारसी - संस्कृत भाषा का एक शब्दकोष फारसी प्रकाश' तैयार किया।

अकबर ने अपने शासनकाल में इस्लाम के प्रति हिन्दुओं में भाईचारा और श्रद्धा जाग्रत करने हेतु संस्कृत में 'अल्लोपनिषद नामक छोटा उपनिषद लिखवाया था।

 दरभंगा के महेश ठाकुर ने  अकबर के समय का इतिहास संस्कृत में लिखा था

शाहजहाँ के शासनकाल में कवीन्द्र आचार्य सरस्वती और जगन्नाथ पंडित राज्य के कवि थे। जगन्नाथ पंडित ने 'रसगंगाधर' और 'गंगालहरी' की रचना की थी।"

 औरंगजेब ने संस्कृत को संरक्षण देना बंद कर दिया था। यद्यपि हिन्दू राजाओं का संरक्षण मिलता रहा, परन्तु बाद में इसकी प्रगति अवरुद्ध हो गई।

 

हिन्दी साहित्य

बाबर, हुमायूँ और शेरखाँ के समय हिन्दी को राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ था लेकिन मलिक मुहम्मद जायसी ने इस काल में पद्मावत (1540नामक रचना लिखी थी। 'पद्मावत' में' परमात्मा के साथ आत्मा के संबंध के विषय में सूफी विचारों और  माया के बारे में हिन्दू विचारों का प्रतिपादन करने के लिए चित्तौड़ पर अलाउद्दीन के आक्रमण का उपयोग एक रूपक के तौर पर किया गया है। अकबर के समय में हिन्दी कवियों को मुगल दरबार में स्थान दिया जाने लगा लेकिन इस काल में व्यक्तिगत प्रयासों से भी हिन्दी साहित्य का काफी विकास हुआ। दरबारी आश्रय में अब्दुर्रहीम खानखाना ने जीवन तथा मानवीय संबंधों के विषय में फारसी विचारों के मेल से मधुर भक्ति काव्य की रचना की। उनके सैकडों दोहे और 'सतसैया हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है।

इसकाल के हिन्दी कवियों में तुलसीदास, सूरदास और रसखान का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है। तुलसीदासने रामभक्ति में लगभग 25 ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें रामचरितमानस और विनय पत्रिका'का महत्वपूर्ण स्थान है। तुलसीदास का अधिकांश जीवन बनारस में बीता था और उन्होंने हिन्दी के अवधि रूप का प्रयोग किया था जो पूर्वी उत्तरप्रदेश में जनभाषा के तौर पर प्रचलित थी।

व्यक्ति के जन्म नहीं, बल्कि कर्म पर आधारित जाति प्रथा की हिमायत करने वाले तुलसीदास मानवतावादी कवि थे। उन्होंने पारिवारिक आदर्शो का समर्थन किया और राम की भक्ति को मोक्ष का मार्ग बताया।

सूरदास अंधे थे और आगरा में रहते थे। अब्दुर्रहीम से उनका सम्पर्क होता रहता था। उनकी 'रचना (सूरसागर) भक्ति रस की सर्वश्रेष्ठ रचना है, रसखान के भजन और प्रेमवाटिका ग्रंथ भी हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है।

 

- अकबर ने बीरबल को 'कविराय' और नरहरि चक्रवर्ती को महापात्र' की उपाधि दी थी।

जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी हिन्दी विद्वानों का सम्मान किया था। जहाँगीर का भाई दानियाल हिन्दी में कविता करता था। जहाँगीर के समय का सर्वश्रेष्ठ कवि केशवदास था। शाहजहाँ के काल में सुंदर कविराय ने 'सुंदर श्रृंगार और सेनापति ने कवित रत्नाकर लिख था

हिन्दी के महान कवि बिहारीदास को राजा जयसिंह का संरक्षण प्राप्त हुआ था।

 

अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ

दक्षिण भारत में मलयालम ने 15वी सदी में अपना साहित्यिक जीवन आरंभ किया था। ट्टथा या कथकलि नामक नृत्य साहित्य की लोकप्रिय विद्या का विकास 16वी सदी में हुआ। तमिल, तेलुगु कन्नड भाषा में भी काफी साहित्य की रचना हुई।

 

एकनाथ और तुकाराम ने मराठी को उसके शिखर पर पहुँचा दिया। एडनाथ मराठी के प्रबल पक्षधर थे। उनका कहना था "यदि संस्कृत की रचना ईश्वर ने की हैं तो क्या प्राकृत को चोरों और बदमाशों ने जन्म दिया? इन झूठे अहंकारों को अलग रखिए ईश्वर किसी भाषा के साथ पक्षपात नहीं करता।"

 

सिक्ख गुरुओं की रचनाओं से पंजाबी को एक नया जीवन प्राप्त हुआ। गैरधार्मिक साहित्य के रूप में कई प्रेम गाथाओं की रचना हुई जिनमें वारिसशाह की हीर राँझा और कवि पीलू की 'मिर्जा-साहिबान' की कथा सर्वोत्तम है। बुल्ले शाह 12वी सदी के एक प्रमुख कवि थे।

गुजरात, बीजापुर, गोलकुंडा, औरंगाबाद और बीदर दखनी उर्दू' साहित्य के प्रमुख केन्द्र थे। गोलकुंडा के कुतुबी शासक दक्खनी साहित्य के प्रमुख संरक्षक थे। उनमें मुहम्मद कुली कुतुबशाह  खुद कवि था।

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