बुधवार, 15 मार्च 2023

राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court)

 राजस्थान संघ का उद्घाटन 30 मार्च, 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा जयपुर में किया गया था। उस समय जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर और कोटा में अधीनस्थ न्यायालयों के साथ अपने अपने उच्च न्यायालय थे।

नये राज्य के उद्घाटन से पहले भारत सरकार ने राज्य की राजधानी और उच्च न्यायालय के स्थान के संदर्भ में सुझान देने हेतु तात्कालिक पेप्सु राज्य के मुख्य सचिव बी. आर. पटेल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसमें ले. कर्नल टी. सी. पुरी और श्री एस. पी. सिन्हा अन्य सदस्य थे।

27 मार्च, 1949 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में समिति ने जयपुर में राजधानी और जोधपुर में उच्च न्यायालय की स्थापना की सिफारिश की थी।

राजस्थान उच्च न्यायालय अध्यादेश, 1949 के द्वारा राज्य में कार्यरत विभिन्न उच्च न्यायालयों को समाप्त कर लिया और पूरे राज्य हेतु एक ही उच्च न्यायालय का प्रावधान किया गया। इस अध्यादेश में यह प्रावधान किया गया कि उच्च न्यायालय जोधपुर और इसे अन्य स्थानों पर, यदि कोई हो तो, जो राजप्रमुख तय करे स्थायी रूप से या विनिर्दिष्ट अवधि के लिए बैठ सकते हैं।


अध्यादेश में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 25 अगस्त, 1949 को राजप्रमुख ने एक अधिसूचना जारी जिसमें यह प्रावधान थे-


1. 29 अगस्त, 1949 को जोधपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय का उद्घाटन होगा।


2. अगले आदेश तक जयपुर और कोटा संभाग के मामलों को निपटाने हेतु जयपुर में और उदयपुर संभाग के मामलों को निपटाने हेतु उदयपुर में भी बैठके होगी (खण्डपीठ लगेगी)।


 उद्घाटन


उच्च न्यायालय का विधिवत उद्घाटन 29 अगस्त, 1949 को जोधपुर में एक भव्य समारोह के साथ सम्पन्न हुआ (राजप्रमुख सवाई मानसिंह की अध्यक्षता में)। राजप्रमुख महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय द्वारा प्रथम मुख्य न्यायाधीश के रूप में श्री कमलकांत वर्मा (इलाहाबाद उच्च न्यायालय और उदयपुर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश) को एवं 11 अन्य न्यायाधीशों को शपथ दिलाई गई। इन 11 न्यायाधीशों में अधिकांश रियासतों का प्रतिनिधित्व करते थे। ये थे-


1. लाला नवल किशोर और 2. कुंवर अमरसिंह जसोल (दोनों जोधपुर से)।


3-4. जस्टिस कंवरलाल बाफना और मो. इब्राहिम (दोनों जयपुर से)।


5-6. जसवंत सिंह राणावत और शार्दुलसिंह मेहता (दोनों उदयपुर से)।


7. जस्टिस दुर्गादास दवे (बूंदी), 8. जस्टिस त्रिलोचन दत्त (बीकानेर)।


9. आनंद नारायण कौल (अलवर), 10. के. के. शर्मा- (भरतपुर)।


11. क्षेमचंद्र/खेमचंद गुप्ता (कोटा)।


3 सितम्बर, 1949 को एक नई अधिसूचना द्वारा पुराने केसों को निपटाने हेतु कोटा और बीकानेर में भी उच्च न्यायालय की बैच स्थापना का आदेश दिया गया, लेकिन इन्हें नये मामलों की सुनवाई का अधिकार नहीं दिया गया था।


संविधान के लागू हो जाने पर राज्य उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के संदर्भ में कुछ परिवर्तन हुए।


1. उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या घटा कर 7 कर दी गई।


2. नवीन योग्यता के मापदंडों के कारण मुख्य न्यायाधीश श्री कमलकांत वर्मा और कुछ अन्य न्यायाधीशों को इस्तीफा देना पड़ा।


3. श्रीनवल किशोर और श्री. मो. इब्राहिम की सेवानिवृति पर उच्च न्यायालय के दो प्रसिद्ध अधिवक्ताओं श्री इंदरनाथ मोदी एवं श्री. डी. एम. भंडारी को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।


 8 मई, 1950 को एक अधिसूचना द्वारा 22 मई 1950 से राजस्थान उच्च न्यायालय की उदयुपर, कोटा एवं बीकानेर बैच को समाप्त कर दिया गया। जयपुर बैच का कार्य जारी रखा गया।


 राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के तहत अजमेर में स्थित न्यायिक आयुक्त के न्यायालय को समाप्त कर दिया गया और जोधपुर में ही उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ पूरे राज्य के लिए स्थापित करने का निर्णय लिया गया। लेकिन यह भी प्रावधान किया गया कि मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल की अनुमति से राज्य के अन्य स्थान पर भी अस्थायी बैच लगा सकते हैं। इसी के अनुरूप मुख्य न्यायाधीश द्वारा 1 नवम्बर, 1956 में जयपुर में एक अस्थायी बैच लगाने की अधिसूचना जारी की।


अजमेर के राजस्थान में विलय से राजस्थान की राजधानी और उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ के स्थान के परिवर्तन की मांग राज्य में उभरने लगी। ऐसी परिस्थितियों में केंद्र सरकार ने इस संदर्भ में सुझाव देने हेतु पी. सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की (बी. के गुप्ता और वी. विश्वनाथ समिति के अन्य सदस्य थे)। समिति ने फरवरी, 1958 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में जयपुर को राजधानी रहने देने और उच्च न्यायालय जोधपुर में ही रखने की सिफारिश की (अजमेर में राजस्व मंडल, RPSC और आयुर्वेद विभाग) तथा उच्च न्यायालय की जयपुर बैच की समाप्त करने की भी सलाह दी।


समिति की सिफारिशों के अनुरूप 1958 में उच्च न्यायालय की जयपुर बैच को समाप्त कर दिया गया।


जयपुर में उच्च न्यायालय की खंडपीठ को समाप्त करने का पूर्वी राजस्थान विशेषकर जयपुर शहर के लोगों द्वारा जोरदार विरोध किया गया। विभिन्न बार एसोसिएशनों और अन्य संगठनों ने जयुपर में उच्च न्यायालय की स्थायी पीठ बनाने की मांग की गई। अंततः 8 दिसम्बर, 1976 को राष्ट्रपति द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर में एक स्थायी पीठ स्थापित करने का आदेश जारी किया गया और 31 जनवरी, 1977 को जयपुर की स्थायी बैच ने कार्य करना प्रारंभ कर दिया।


जयपुर बैंच का क्षेत्राधिकार- 1. जयपुर, 2. अजमेर, 3. अलवर, 4. भरतपुर, 5. धौलपुर, 6. कोटा, 7. बूंदी, 8. झालावाड़, 9. बारां, 10. झूंझनू, 11. सवाई माधोपुर, 12. टोंक, 13. करौली, 14. सीकर, 15. दौसा।


इन 15 जिलों के अलावा शेष 18 जिलों पर क्षेत्राधिकार जोधपुर की मुख्यपीठ का हैं। इसके अलावा मुख्य न्यायाधीश को यह विवेकाधिकार हैं कि वे उपर्युक्त 15 जिलों के किन्हीं केसों के लिए जोधपुर का क्षेत्राधिकार तय कर सकते हैं।

 राज्य में उच्च न्यायालय की स्थापना के समय मुख्य न्यायाधीश सहित कुल न्यायाधीशों की संख्या 12 थी (11 + 1)।

- 26 जनवरी, 1950 को यह संख्या 7 कर दी गई थी (6+1)।


- वर्तमान में राज्य में न्यायाधीशों की संख्या (मुख्य न्यायाधीश सहित) 40 से बढ़ाकर 50 कर दी गई हैं।


 राज्य के प्रथम मुख्य न्यायाधीश श्री कमलकांत वर्मा थे। अब तक सर्वाधिक अवधि तक कार्यरत रहने वाले मुख्य न्यायाधीश श्री कैलाश नाथ वांचू थे, जो 2 जनवरी, 1951 से 10/8/1958 तक कार्यरत रहे थे। वे राज्य के दूसरे मुख्य न्यायाधीश भी थे।

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