गुरुवार, 16 मार्च 2023

मनसबदारी व्यवस्था

 

मनसबदारी व्यवस्था

 

मुगलों की सैन्य व्यवस्था में मनसबदारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान था  जिसे अकबर ने प्रारंभ किया था। यह ऐसी व्यवस्था थी, जिसके तहत मंसब की प्राप्ति से प्राप्तकर्ता की प्रशासकीय श्रेणीक्रम में स्थिति और पद का निर्धारण होता था। प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को मनसब प्रदान किया  गया था।

मंसब- अरबी भाषा का शब्द है )

 

आधार

 

अकबर द्वारा प्रारंभ की गई मनसबदारी व्यवस्था पूर्णतः नवीन नहीं थी। इसका आधार  मंगोल सेना की दशमलव प्रणाली ( खलीफा अब्बा सईद द्वारा प्रारंभ की गई व चंगेज का तथा तैमूर द्वारा प्रयुक्त ) थी, जिसका प्रयोग कुछ हद तक, सल्तनत काल में ही हो गया था। . हुमायूँ ने भी अपने काल में अमीरों के वर्गीकरण का प्रयास किया था (12 वर्ग ) लेकिन से वर्गीकरण सैनिक दस्ते की क्षमता के आधार पर नहीं किए गए।व्व्व

कुल मिलाकर मसंब व्यवस्था का आधार तुर्क मंगोल सैन्य व्यवस्था को माना जाता है।

स्वरूप, शुरू करने के कारण व विकास

मंसब शब्द के प्रयोग में दो अलग-अलग श्रेणियाँ' शामिल थी, जिन्हें जात और सवार - पद कहा जाता था। जात पद-मसंबदार का व्यक्तिगत वेतन (तलब ए खास) तथा शासकीय वर्ग में उसका पद स्तर निश्चित करता था।

सवार पद मंसबदारों द्वारा रखे जाने वाले घुड़सवारों की संख्या तथा उनके वेतन ( तलब ए ताबीनान) को निर्धारित करता था।

 मंसबदार द्वारा अपने जात पद की तुलना में रखे गए घुडसवारों की संख्या से उसकी श्रेणी का बोध होता था । अर्थात् जात पद के बराबर सवार रखने वाला प्रथम श्रेणी का मंसबदार, जात पद से कुछ कम अथवा आधे घुडसवार रखने वाला द्वितीय श्रेणी का मनसबदार तथा आधे से कम घुडसवार रखने वाला तृतीय श्रेणी का मंसबदार माना जाता था।

 मनसबदारी व्यवस्था शुरू करने के कारण

 

(i)                  अमीरों का वेतन निर्धारण पादशाह अपनी मर्जी से करता था, जिसके लिए कोई विशिष्ट नियम नहीं होता था। जिसके कारण जो क्षेत्र उन्हें मिलता था उनमें मनमर्जी से अपनी सेना बढाकर शक्ति बढाते थे।

(2) उमरावर्ग में उत्तरदायित्व बोध का अभाव था।

(3) सशस्त्र टुकडियों पर नियंत्रण की व्यवस्था का अभाव था ।

(4) अमीरों वर्ग द्वारा विद्रोहों के कारण उनकी शक्ति पर नियंत्रण करने की आवश्यकता थी। (5) कुछ अमीर अपेक्षित सैन्य दल से कम सैनिक रखते थे।

विकास

 अकबर के शासन के ग्यारहवे वर्ष (1566-67) में सैन्य सुधार की शुरूआत हुई, जबकि उमरा और शाही सेवकों के लिए निश्चित संख्या में सैनिकों का रखा जाना आवश्यक उतरदायित्व निर्धारित किया गया, जिससे की प्रत्येक अमीर शाही सेना के लिए कुछ सैनिक हमेशा तैयार रखे।

 

ग्यारहवे वर्ष के इन सुधारों का सांख्यिकी श्रेणी निर्धारण से कोई " संबंध नहीं था, इन सुधारो द्वारा केवल निर्धारित राजस्व (जागीर) के आधार पर सैनिक उत्तरदायित्व की परिधि तय की गई थी (प्रति सवार की निश्चित  दर के आधार पर)।

(- इस सुधार को कुछ विद्वान (वर्मा) इस तरह व्यक्त करते हैं " अकबर के शासन के 11वे वर्ष में पहली बार मनसब प्रदान किए जाने का संदर्भ मिलता है, लेकिन वेतन अभी भी (18 वे वर्ष तक) पद से संबंधित दायित्वों के निरूपण किए बिना दिए जाता था।।

संख्या पर आधारित पदों( सांख्यिकी श्रेणी के आधार पर निश्चित संख्या में सवार रखना) की शुरूआत 18 वे शासकीय वर्ष (1573-74) में हुई।

अबुल फजल के अनुसार अठारहवे शासकीय वर्ष में दाग का प्रचलन हुआ और शाही अधिकारियों के पद श्रेणी निश्चित किए गए। पर इन पर अमल अगले वर्ष (1574-75) में किया गया।

अधिकारी और अन्य सेवक नकद वेतन प्राप्त करते थे तथा उनकी योग्यता एवं  सैनिक संख्या के आधार पर उनकी श्रेणी निश्चित की गई। इस प्रकार प्रथम बार मंसब शब्द को पद के अर्थ में प्रयुक्त किया गया।

मुअतमिद खाँ ने 18 वे वर्ष में पद के अर्थ मे मनसब के प्रचलन का विवरण देते हुए कहा है कि देहबासी (10) से पंचहजारी (5000 ) तक पद, श्रेणियां निर्धारित की गई तथा प्रत्येक के लिए वेतन निर्धारित किया गया।

इस समय एक नियम यह भी प्रस्तावित किया गया कि मनसबदार अलग से अपने व्यक्तिगत घोड़े तथा हाथी दाग हेतु प्रस्तुत करेंगे।

एक सिंह अस्पा (तीन अश्वों वाला) सैनिक को तीन घोडे लाने होते थे, जबकि, दुअस्पा सैनिक को दो और यक अस्पा सैनिक को एक घोड़ा दाग के लिए प्रस्तुत करना पड़ता था।

मातहत सैनिकों के वेतन की दर अलग से निर्धारित की गई थी।

 18 वे वर्ष के सुधारों की एक  विशेषता यह भी थी कि मनसबदार अपने सैनिकों के घोड़ों के अतिरिक्त अन्य जानवरों घोड़ो, हाथी, ऊँट भी रखने को बाध्य था। और निर्धारित नियमों के अनुसार उन्हें रखने का खर्चा दे दिया जाता था।  यह व्यवस्था बाद में प्रचलित नियमों से भिन्न थी, जिसके अनुसार शाही जानवरों की रखने का खर्च मनसबदारों को भुगतना पडता था, जिसे खुराक ए दव्वाब कहा जाता था।

तीसरा चरण

इस व्यवस्था के बावजूद मनसबदारों द्वारा अपने सैनिक दायित्वों को पूरा करने में कोताही की जाती थी तथा निरीक्षण के समय उनके द्वारा निर्दिष्ट संख्या में सैनिक दिखाने की केवल खानापूर्ति कर दी जाती थी; अर्थात् वे स्थायी रूप से सैनिकों को व्यवस्था नहीं करते थे। इसी समस्या का समाधान करने हेतु शासन के 40वे वर्ष  (1595-96) में ‘सवार' पद की व्यवस्था की गई। पूर्व प्रचलित मनसब को अब जात कहा जाने लगा, जिससे मनसबदार के निजी वेतन का बोध होता था, इसी से निर्दिष्ट तालिका के अनुरूप निजी जानवरों (रवासा) की व्यवस्था उसे करनी होती थी।

नवीन पद ‘सवार' से अब मनसब की श्रेणी का बोध होता था। प्रथम श्रेणी के मनसबदार को अपने जात पद के बराबर सवारों की व्यवस्था करनी होती थी। ( इस प्रकार 5000/5000 जात - सवार मनसब होने का अर्थ था कि उस मनसबदार को अपने जात मनसब के बराबर ही घुडसवारों की व्यवस्था करनी थी)।

द्वितीय श्रेणी के मनसबदार को अपने जात पद से कुछ कम, लेकिन आधे से कम नहीं, घुडसवारों की व्यवस्था करनी होती थी, इस दशा में उसके मनसब का उल्लेख 5000/3000 रूप में किया जाता था।

तीसरी श्रेणी में वे मनसबदार आते थे, जिनका सवार पद, जात पद के आधे से कम था या जिनके पास सवार पद था ही नहीं। जैसे 5000/2000 जात - सवार का मनसबदार।

NOTE कुछ विद्वानों के अनुसार जात व सवार पद की स्थापना 1597 में हुई।

अबुल फजल के अनुसार अकबर ने मनसबदारों को 66 श्रेणियों (अल्लाह शब्द के अंको की गणना के आधार पर (1+30+30+5 का योग) में विभाजित किया था परन्तु अबुल फजल 33 श्रेणियों के नामों का ही उल्लेख करता है, जिससे प्रतीत होता है कि व्यवहार में 33 प्रकार के मनसब ही प्रदान किए जाते थे।

D.u . - "अकबर के समय में सबसे बड़ा मनसब 5000/ 5000 जातसवार का होता था, जो केवल राजकुमारों तथा कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को ही दिया जाता था। "

 L.P. शर्मा  - अकबर ने अपने आरंभिक काल में 10 से लेकर 10,000 और बाद में 12000 की संख्या तक के मनसब प्रदान किए। जब सबसे बड़ा मनसब 10,000  का था तब 5000 से ऊपर का मनसब केवल शाहजादों को दिया जाता था, परन्तु जब सबसे बड़ा मनसद, 12000 का हो गया तब सरदारों को 7000 तक के मनसब प्रदान किए गए और ऊपर के मनसब शाहजादों के लिए सुरक्षित रखे गए । मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका को 7000 - 7000 हजार का मनसब प्रदान किया गया था । एकलपद ?)

सभी मनसब, यहां तक कि 10/10 जात व सवार भी पादशाह द्वारा प्रदान  किए जाते थे । यद्यपि ऐसा करते समय वह अपने अमीरों की सिफारिश पर भी ध्यान रखता था।

यद्यपि निम्न श्रेणी के मनसबदारों को उच्च श्रेणी के मनसबदारों के अधीन कार्य करना होता था, लेकिन उसका अर्थ यह नहीं था कि उसका सैनिक दस्ता उच्चश्रेणी के मनसबदार के अधीन था। बड़े मनसबदारों के साथ उन्हें केवल सुविधा हेतु संलग्न किया गया था, वे उसके अधीनस्थ नहीं थे। ( पंच हजारी मनसबदार अपने अंतर्गत एक-एक हजार के पांच मनसबदार रख कर आवश्यक घुडसवारों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, वरन् उसे स्वयं के घोड़ों द्वारा पद का औचित्य दर्शाना होता था।

दु अस्पा - सिंह अस्पा प्रणाली

> जहाँगीर के शासनकाल के 10 वे वर्ष (1615) में अकबर कालीन सवार पद 'में' परिवर्तन किया गया। इस वर्ष महाबत खाँ की दक्षिण में मुगल सेनापति के रूप में नियुक्ति की गई तथा ईनाम स्वरूप उसके सवार पद में से 1700 सवार दुअस्पा सिंह अस्पा कर दिए गए। किसी अमीर को दुअस्पा-सिंह अस्पा  सवार पद दिए जाने का यह प्रथम उल्लेख था।

 इस नवीन व्यवस्था के अनुसार किसी मनसबदार के सवार पद में से आधे या पूरे या कुछ सवारों को दो अस्पा सिंह अस्पा बना दिया जाता था। इससे सवार पद के"इस भाग की संख्या दुगुनी हो जाती थी।

'उदाहरण

एक मनसबदार के पास 5000 जात/ 5000 सवार का मनसब है और उसे दो अस्पा सिंह अस्पा' अर्थात् सभी पद दो अस्पा सिंह अस्पा(-दो घोडेवाले) बना दिया गया हो तो उस स्थिति में उस मनसबदार को दुगुनी संख्या में (5000+5000) सैनिक  (घुडसवार) रखने की अनुमति दी जाती थी।

उदाहरण2:

यदि किसी मनसबदार के 5000 सवार पद मे से 3000 सवार दो अस्पा सिंह अस्पा कर दिए जाते तो बचे हुए 2000 सैनिक बारावर्दी कहलाते। और उस मनसबदार  के पास कुल सवारों की संख्या होती 2000 + (3000×2) = 8000 सवार |

इस व्यवस्था  में जो अतिरिक्त संवार संख्या बनाई जाती थी, उसके लिए  अलग से धनराशि प्रदान की जाती थी।

नई व्यवस्था लाने के कारण

(1) सम्राट बनने के बाद जहाँगीर अपने विश्वास पात्र कुलीनों की पदोन्नति करना चाहता था और उनको सैनिक दृष्टि से मजबूत करना चाहता था, परन्तु इसमें एक समस्या थी।

अकबर के समय से यह नियम बनाया गया था कि किसी मनसबदार का सवार पद उसके जात पद से अधिक नहीं हो सकता था। इस स्थिति में सवार पद बढ़ाने पर जात पद को भी बढ़ाना पड़ता। जात पद में बढोतरी करने पर व्यक्तिगत वेतन के रूप में अतिरिक्त भुगतान करना पडता और इससे राजकोष पर दबाव पडता । इसके अलावा पदानुक्रम में कुछ कुलीनो के जात की भी बढ़ाना पड़ता, जिससे अन्य कुलीनों में ईर्ष्या का भाव पैदा होता।

अत: दुअस्पा सिंह अस्पा ऐसी प्रणाली थी जिसके माध्यम से जात पद या मनसब क्रमानुक्रम को छेड़े बिना अतिरिक्त सवार प्रदान किए जा सकते थे।

जहाँगीर के शासनकाल में दुअस्पा- सिंह अस्पा सवार पद दिए जाने के कम ही दृष्टांत मिलते हैं। परन्तु शाहजहां के काल में ऐसे पदों में काफी वृद्धि हुई थी। औरंगजेब के काल में इसमें और भी वृद्धि हुई थी।

महाना वेतन प्रणाली (शाहजहाँ )

अकबर के काल से ही यह शिकायत आ रही थी कि जागीरों की अनुमानित आय (जमा) और वास्तविक आय (हासिल) में अंतर होता था और जागीरों से होने वाली वास्तविक आय कम होती थी।

इससे मनसबदारों को व उनके मातहत दस्तों को आर्थिक हानि का सामना करना पडता था, क्योंकि उनके वेतन की अदायगी जागीर से होने वाली आय में से ही होती थी।

इस समस्या का हल शाहजहां ने महाना वेतन प्रणाली के रूप में निकाला। ( वास्तविक वसूली के आधार पर) (इसी प्रणाली को शाहजहाँ कालीन इतिहासकार"लाहौरी ने एक-पांचवा (1/5) नियम के रूप में विस्तृत रूप से विवेचित किया है।

 इस प्रणाली के अनुसार यदि किसी जागीर से आय 50% ही होती तो उसे"शिश्माहा जागीर (छहमाही) माना जाता और यदि  आय ¼ होती तो उसे सीमाही जागीर (तीन माही) माना जाता था।

इसी अनुपात में (50% & 75%) उनके उत्तरदायित्वों कटौती कर दी जाती थी।

 शाहजहाँ के उत्तरार्द्ध काल में दक्षिण में हासिल और जमा का अनुपात 1:3  था। इस प्रकार दक्षिण में अधिकांश जागीर चार माही थी।

'नवीन व्यवस्था का कारण (1) पूर्व वर्णित (2) अगर बादशाह जागीरों की हासिल में कमी के आधार पर मनसबदारों के जात/ सवार में कमी करता तो इसे मनसबदारों द्वारा अपनी अवनति माना जाता, जिससे असंतोष फैलता ।

 

लेकिन इस व्यवस्था के कारण सैनिक दायित्वों में कमी कर दी गई।

• यदि सैन्य अभियान के सिलसिले में मनसबदार को उत्तर पश्चिमी सीमा  प्रदेशों में तैनात किया जाता था तो उसे सवार पद में उल्लेखित सैनिकों का 1/5 सैनिकों की ही व्यवस्था उस स्थानों की कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए करनी होती थी। 'औरंगजेब के शासन काल में 6 माही जागीर से अधिक न देना एक सामान्य, प्रवृत्ति बन गई थी।

मशरूत (सशर्त सवार पद):

औरंगजेब के काल में यद्यपि दुअस्पा सिंह अस्था प्रणाली प्रचलित थी लेकिन इस तरह की वृद्धि स्थायी होती। लेकिन महाना वेतन के कारण सैनिक दायित्वों में  की कटौती के कारण सरदारों को सैन्य शक्ति कम हो गई थी, अतः इसके प्रभाव को कम करने और सक्षम सरदारों को महत्वपूर्ण मुहिम अभियानों पर भेजते समय, या फौजदार, किलेदार के पद पर नियुक्ति के समय उसके सवार पद में है अतिरिक्त वृद्धि का एक और माध्यम निकाला गया, जो मशरूत या सशर्त सवार पद कहलाता था। तबादला या कार्य पूरा होने पर मशरूत पद वापस ले लिया जाता था। लेकिन कभी कभी मशरूत को सामान्य पद में मिला दिया जाता था।

मनसबदार के उत्तरदायित्व/ वेतन  में कटौतियाँ:

चौथाई रवासा - मनसबदार को युद्ध में काम आने वाले हाथी, घोड़ों, बोझा ढोने वाले पशुओं व गाड़ी आदि की व्यवस्था करनी होती थी। इस व्यवस्था में  होने वाला व्यय ' जात’ मनसब में निर्धारित वेतन में शामिल होता था।

लेकिन सवारों की भाँति मनसबदार पशुओं की व्यवस्था में भी कोताही बरतते थे। इसीलिए 17वी  संदी के प्रारंभ में मनसबदारों के वेतन में से इस मंद में व्यय होने वाली राशि की कटौती करना प्रारंभ कर दिया गया, जिसे " चौथाई रवासा कहा जाता था। (निजी वेतन का 25%)

 लेकिन यह कटौती 1681 के बाद समाप्त कर दी गई क्योंकि इसी वर्ष वेतन की नई दरें लागू की गई थी जिसके तहत अकबरकालीन वेतन की तुलना में 25-30% राशि की कमी आ गई थी। चूंकि मनसबदार पशुओं की व्यवस्था में कोताही करते थे, अत: इस बाध्यता को समाप्त कर दिया गया और  इस मद से मिलने वाली राशि भी उनके वेतन में शामिल नहीं रहीं।

लेकिन उनके जात पद के अनुरूप निर्दिष्ट मात्रा में निजी स्तर पर अपने तथा अपने सैनिकों के दस्तों की आवश्यकता के अनुरूप पशुओं की व्यवस्था करनी थी।

मनसबदारों पर शाही पशुओं का उत्तरदायित्व हटाने पर शाही अस्तबल की क्षमता का विस्तार किया गया था। लेकिन इसका आर्थिक बोझ शाही कोष पर न बढ़े इस हेतु मनसबदारों के निजी वेतन से खुराके फीलान' (हाथियों का चारा) 'नाम से कटौती प्रारंभ कर दी गई ।

शाही घोड़ों की खरीदी हेतु मनसबदारों के वेतन में से 'इरमास’ नामक कटौती भी होती थी।

चौथाई कुल नामक कटौती दक्षिण राज्यों की सेवा को छोड़ कर आए मनसंबदारों के जात और सवार दोनों मंदो के धन से की गई। इसकी शुरूआत शाहजहां के काल में हुई थी।

 

"Some Fats :

 अकबर के शासन काल में 500 एवं औरंगजेब के शासनकाल में 10,00 की संख्या के नीचे के मनसबदारों को मनसबदार' पुकारा जाता था।

500 या 1000 से 2500/3000 तक सैन्य संख्या वाले मनसबदारों को 'अमीर' कहां जाता था और 2500/3000 से ऊपर की संख्या वाले मनसबदार को उमरा ए आजम  कहा जाता था।  सैनिक अधिकारियों में सबसे प्रतिष्ठा का पद खान ए-जमा और उसके बाद खान-ए-खाना था। यह पद एक समय  में एक व्यक्ति को ही दिया जाता था।

 

दागमहाली नामक विभाग घोडो और हाथियों को दागने के लिए खोला - गया था। प्रत्येक घोडे पर एक शाही निशान और एक मनसबदार का निशान दागा जाता था।

सभी मनसबदारों की नियुक्ति सीधे सम्राट द्वारा की जाती थी। सभी प्रत्याशियों को मीरबक्शी  सम्राट के सम्मुख प्रस्तुत करता था। वजीर की मोहर के बाद मनसब पद प्रदान करने का आदेश जारी होता था।

 

मनसबदारों को अपनी सेना का नियमित निरीक्षण और शारीरिक सत्यापन करवाना होता था, यह कार्य मीरबक्शी का विभाग सम्पन्न करता था। इसे 'दागो चेहरा' कहा जाता था।

मनसबदारी व्यवस्था प्रभाव

इस प्रणाली के लागू करने से मात्र नकद वेतन अथवा जागीर में भूमि दे देने से और निरीक्षण की समुचित व्यवस्था से ही मुगल शासकों को सहज में ही लाखों सैनिकों और घुडसवारों की सेवा उपलब्ध होने लग गई

2) इस प्रणाली से एक सीमा तक सेनापति की नियुक्ति में भी सहायता मिली।

 अधिकांश मनसबदारों को वेतन नगद न देकर जागीर की आय के रूप में दिया जाता था, (कुछ मंसबदार नकद वेतन प्राप्त करते थे) अतः इससे मुगल अधिकृत क्षेत्र की आय का मूल्यांकन करने में सहायता मिली।

घुडसवारों की संख्या में वृद्धि से शस्त्र और सैनिक सामान की मांग बढ़ी, जिससे लघु उद्योग और दस्तकारी को बढ़ावा मिला

लेकिन बाद के समय में मनसबदारों की सैन्य और घुडसवार शक्ति मु गल साम्राज्य को नष्ट करने में सहायक रही, जब मनसबदारों में गुटबंदी और स्वतंत्र होने की प्रवृति बढ़ गई थी।

मुगलकाल में नई फसलों का आगमन

 

मुगलकाल में बागवानी अपने चरम पर थी। आज भारत में उपलब्ध बहुत से फलों का आगमन 16वीं 17वीं सदी में ही हुआ था। सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने अमेरिका के कई लों का यहां उत्पादन प्रारंभ किया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अन्नासास था, जो शीघ्र ही संपूर्ण भारत में लोकप्रिय हो गया था। अबुल फजल ने भी इसका उल्लेख किया है।

पीते और काजू के उत्पादन का प्रारंभ भी पुर्तगालियों द्वारा किया गया, किन्तु इनके उत्पादन की प्रगति धीमी रही।

लीची और अमरूद का आगमन बाद के काल में हुआ था। अकबर के समय  काबुल से चेरी लाई गई और कलम लगाकर इसे कश्मीर में उपजाया गया।। कलम की तकनीक से कई फलों की किस्मों में सुधार किया गया, जिनमें आम की हापुस किस्म सबसे प्रमुख थी। काबुल से खरबूजे और अंगूर के विभिन्न प्रकारों के बीज लाकर बोए गए।

आलू, शकरकंद और टमाटर का आगमन 17 वीं सदी और उसके बाद में हुआ था।

NOTE : अमेरिका से आने वाली फसलों' - फलों में अन्नानास, काजू, आलू प्रमुख थे। लाल मिर्च का आगमन भी बाहर से हुआ था(18 भी सदी में)

दक्षिण भारत में व्यापक पैमाने पर मसालों का उत्पादन होता था। वहां सुपारी का भी उत्पादन होता था। बिहार का मगही पान और बंगाल के पान प्रसिद्ध थे।

मुगलकाल में भूराजस्व व्यवस्था

 

मुगलकाल में भूराजस्व व्यवस्था

मुगल काल में लगान फसल पर लगता था, जबकि बाद मे अंग्रेजीकाल में भूराजस्व को जमीन के लगान के रूप में वसूल किया गया था, अतः मुगल भूराजस्व व्यवस्था अंग्रेजी व्यवस्था से भिन्न थी।

मुगल काल में भूराजस्व के लिए 'फारसी शब्द 'माल' और माल वाजिव शब्द का प्रयोग हुआ था। खराज शब्द का प्रयोग नियमित रूप से नहीं होता था।

बाबर और हुमायूँ के समय मे भूराजस्व व्यवस्था में कोई व्यवस्थित सुधार नहीं किया जा सका था। बाबर के समय में संपूर्ण भूमि को जागीरों में बाँट दिया गया था। और हुमायूँ ने शेरशाह द्वारा स्थापित सुव्यवस्थित लगान व्यवस्था के स्थान पर परम्परागत जागीरदारी व्यवस्था को पुनः स्थापित किया था।

लेकिन अकबर ने भूराजस्व व्यवस्था के महत्व को समझ उसे व्यवस्थित रूप दिया था। अकबर द्वारा स्थापित राजस्व प्रणाली का मूल ढाँचा शेरशाही व्यवस्था से लिया गया था।

=> शेरशाह ने भूमि की पैमाइश पर आधारित जब्ती (नकद) प्रथा अपनाई थीं। उसने तीन श्रेणियों की भूमि की औसत उत्पादकता का 1/3 कर के रूप में निर्धारित कर रे (राई) प्रणाली अपनाई थी।

अकबर ने शेरशाह की व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण सुधार भूमि के वर्गीकरणे क्षेत्र में किया। भूमि चार श्रेणियों में विभक्त की गई –

(1) पोलज - जिस पर हर वर्ष खेती होती है।

(2) परती (पड़ती), इस प्रकार की भूमि में एक वर्ष के अंतर पर खेती की जाती थी।

(3) चाचर - वैसी भूमि को चाचर कहा जाता था जिसमें दो से चार वर्ष तक खेती नहीं की जाती थी।

(4) बंजर -पांच वर्ष या उससे अधिक समय तक काम नहीं लाई गई भूमि बंजर भूमि कही जाती थी।

 खेती में चाचर और बंजर भूमि पर रियायती दरों से लगान निर्धारण होता था।

किसी भी सुव्यवस्थित कर प्रणाली की तरह मुगलकालीन भूराजस्व की वसूली की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती थी। प्रथम कर का निर्धारण (तखशीस जमा) तथा द्वितीय वास्तविक वसूली (हासिल ) |

भूराजस्व का निर्धारण करने के बाद राज्य द्वारा एक दस्तावेज जारी किया जाता था जिसे पट्टा, कौल, करार के नाम से जाना जाता था। जिसमें किसानों द्वारा देय राजस्व मांग की दर का उल्लेख होता था।

इसके साथ-साथ किसान को कबूलियत देनी पड़ती थी कि उसे यह निर्धारण मंजूर है और वह कब तथा कैसे भुगतान करेगा।

अकबर के सिंहासनारोहण के समय तक शेरशाह द्वारा स्थापित राजस्व व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई थी। शेरशाह की जब्ती (नकदी) व्यवस्था का स्थान बँटाई ने ले लिया था और किसानों को अपनी उपज का आधा भाग राज्य को देना पड़ता था।

वास्तविक हासिल बहुत कम थी और इस कारण जमा के ऑकडे असत्य नजर आने लगे थे। अतः राज्य की आय के साधनों को नियमित करने एवं राज्य की वास्तविक आय के ज्ञान के लिए नवीन बंदोबस्त करना आवश्यक था।

इस कार्य के लिए अकबर ने अपने शासन के प्रारंभ में जब्ती व्यवस्था को अपनाया। यद्यपि अकबर और उसके बाद के शासकों के काल में अन्य प्रणालियाँ भी चालू रही थी।

जब्ती व्यवस्था

यह मुगल कालीन राजस्व निर्धारण की सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली थी। जब्त शब्द जरीब (एक नाप) का समरूप है।

जब्ती व्यवस्था की शुरुआत शेरशाह के शासनकाल से मानी जाती है, अकबर के काल में कई परिवर्तनों के बाद उसने अंतिम रूप ग्रहण किया था। अकबर के शासन के प्रारंभिक वर्षों में शेरशाह द्वारा निर्धारित 'राई' को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन इस प्रणाली में एक त्रुटि यह थी कि विभिन्न प्रांतों में लगान को नकदी में वसूल करने के लिए गल्ले की कीमतें एक समान ही रखी गई थी। जो कि अव्यावहारिक थी । इससे कई वर्षों से तक लगान भी एक सी मात्रा में ही प्राप्त होता रहा था।

इसके अलावा अब्दुल मजीद आसफ खाँ, जिसे 1560 में वित्तमंत्री नियुक्त किया गया था, ने सरदारों को प्रसन्न करने हेतु उनकी जागीरों की आय को बढ़ा-चढ़ा कर बताया था, जिससे राज्य ,जागीरदार व प्रजा में से किसी को लाभ नहीं था, लेकिन हानि जरूर होती थीं।

अकबर के काल में लगान व्यवस्था को सुधारने का कार्य दीवान मुजफ्फरखाँ ने शुरू किया, जिसे 1564 में दीवान बनाया गया था। उसने भूराजस्व की दरों को व्यवस्थित करने और विश्वस्त भू-आँकडों को एकल करने के प्रयास किए

 उसने राज्य की वास्तविक लगान से आय का पता लगाने हेतु दस कानूनगों नियुक्त किए। इन्होंने स्थानीय कानूनगों के लेखों के आधार पर आय का लेखा-जोखा तैयार किया जो जमाई हल हासिल पुकारा गया। लेकिन यह पूर्णत: सही नहीं था क्योंकि इसमें उत्पादन का मूल्यांकन नहीं किया गया था।

लेकिन इससे एक परिवर्तन अवश्य हुआ कि  1565-66 और उसके बाद हर साल प्रत्येक फसल की नई स्थानीय दरें तय की जाती( गल्ले की कीमत) अथवा हर स्थान की राई बदल जाती थी।अर्थात् अब यह निश्चित किया गया कि विभिन्न स्थानों पर गल्ले की जो कीमत होगी उन्हीं के आधार पर किसान नकद रूप से लगान देंगे। और गल्ले  की कीमत प्रतिवर्ष तय की जाएगी। इस प्रणाली को जाब्ती  ए हरसाला कहा गया।

लेकिन प्रतिवर्षीय फसल दरों को नकदी में परिवर्तन करने के कारण किसानों की कठिनाइयों खूब बढ़ गई थी। अबुल फजल के अनुसार साम्राज्य काफी विस्तृत हो चुका था, और इस तरह स्थानीय कीमतों की सूची दरबार में भेजकर उसी वर्ष स्वीकृति प्राप्त करने में बहुत देर हो जाती थी। स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बिना, फसल की वसूली का समय आ जाने के कारण स्थानीय अधिकारी संभावित दरों से लगान वसूल कर देते थे। अत: किसानों की शिकायत रहती थी उन से बाद में स्वीकृति प्राप्त दरों से अधिक वसूलकर लिया गया, अथवा कभी कभी जागीरदार की शिकायत बकाया भूराजस्व के विषय में रहती थी। भ्रष्ट लोग कीमतों के असत्य आँकड़े भी भेजते थे।

ऐसी परिस्थितियों में 1566 ई. में खालसा भूमि के दीवान शिहाबुद्दीन अहमद की सिफारिश पर मुजफ्फरखाँ के प्रयोग के स्थान पर नश्क व्यवस्था को आरंभ किया गया जिसके अनुसार पैदावार का अनुमान लगाकर लगान वसूली जाने लगी। लेकिन 1570 में जब मुजफ्फर खाँ को पुन: दीवान नियुक्त किया गया तो 'जाब्ता ए हरसाला' को पुनः लागू कर दिया गया लेकिन इस बार भूमि की पैमाइश के अलावा पैदावार का सही पता लगाने की व्यवस्था भी की गई।

इसी दौरान अकबर ने गुजरात विजय के बाद टोडरमल को वहां सर्वेक्षण एवं नवीन जमा के मूल्यांकन का कार्य सौंपा और 6 महीने के भीतर टोडरमल ने गुजरात में राजस्व बंदोबस्त की व्यवस्था को काफी व्यवस्थित कर दिया, यहां अपनाए गए उसके तरीके ही बाद में आइने दहसाला के आधार बने।

इसी समय अकबर ने 1574-75 में परम्परागत स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों (परगना) को समाप्त कर अपने साम्राज्य को (बंगाल, बिहार और गुजरात को छोड़कर) 182 कृत्रिम इकाइयों में विभक्त कर दिया, जिसमें से प्रत्येक की आय एक करोड़ दाम (2.5 लाख ₹) थी और इन इकाइयों पर आमिल (करोड़ी) नामक अधिकारियों (182) को नियुक्त कर दिया। उसका मुख्य काम अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम का राजस्व एकत्र करना था। संपूर्ण जागीर भूमि को इसी समय खालसा में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया, लेकिन यह परिवर्तन सफल नहीं हुआ लेकिन आमिल का पद बाद के काल में भी बना रहा।

 अकबर ने अपने शासनकाल के 24वे वर्ष (1580) में आईने दहसाला' नामक नई व्यवस्था शुरुआत की, जिसे टोडरमल बंदोबस्त' भी कहा जाता है।

इस प्रणाली के तहत पिछले दस (दह) साल के दौरान अलग-अलग फसलों की औसत उपजों और उनकी औसत कीमतों का हिसाब लगाया गया। औसत उपज का एक तिहाई भाग राज्य का हिस्सा तय किया गया। राजस्व का भुगतान नकद के रूप में करने की व्यवस्था की गई। इसके लिए पिछले दस सालों की औसत कीमतों की अनुसूची के आधार पर उपज में राज्य के हिस्से को नकद  में तय कर दिया गया। इस प्रकार राज्य के हिस्से में आने वाली प्रति बीघा जमीन की उपज 'मन' में बताई गई, लेकिन औसत कीमतों के आधार पर राज्य का हिस्सा प्रति बीघा रूपये में तय किया गया। (इस तरह जो अंतिम नकद दर ( दस्तूर) तय की गई उसे अमलदस्तूर के नाम से जाना गया)।

 बाद में इस व्यवस्था में और भी सुधार किया गया। हिसाब मे स्थानीय कीमतों का ध्यान रखा गया। इतना ही नहीं, एक ही किस्म वाले अलग-अलग परगनों को भी पृथक् राजस्व निर्धारण हलको में समूहबद्ध कर दिया गया। इस प्रकार किसान को न केवल स्थानीय उपज के आधार पर बल्कि स्थानीय कीमत  के भी आधार पर राजस्व अदा करना पड़ता था।

भूमि की नाप के लिए अभी तक जूट की रस्सियों (मूंज की रसियो, जिसे तनब कहा जाता था) का प्रयोग होता था, जो मौसम के प्रभाव से घट या बढ जाती थी। इसके स्थान पर बाँस की जरीब का (लग्गो) का प्रयोग किया गया, जिसके टुकडे लोहे की पत्तियों से जुड़े हुए थे।  जरीब का प्रयोग करने वाला अकबर प्रथम शासक था)।

। कृषियोग्य भूमि को चार भागों में बाँटा गया था -पोलज , परती, चाचर और बंजर | किसानों को भूमि का स्वामी स्वीकार किया गया था और राज्य ने किसानों से सीधा संपर्क स्थापित किया था। इस प्रकार शेरशाह की भाँति यह व्यवस्था भी रैयतवाड़ी थी। लगान के लिए किसानों को पट्टे दिए जाते थे, जिसमें उनकी भूमि का विवरण होता था किसानों से कबू‌लियत भी लिखवाई जाती थी।

कृषि में सुधार हेतु समय-समय पर किसानों को सहायता दी जाती थी और आपदा काल में लगान कम या माफ कर दिया जाता था।

NOTE 1. इस प्रणाली में यद्यपि कर का निर्धारण पिछले दस वर्षों के उत्पादन और प्रचलित, मूल्यों के आधार पर किया जाता था, लेकिन इसका 1/10 भाग हर साल वसूला जाता था जिसे 'माल ए हरसाला' कहा जाता था।

दहसाला प्रबंधन जब्ती प्रथा या नकदी ( पैमाइश और गल्ले की किस्म के आधार पर लगान तय करना) का ही विकसित रूप था, लेकिन सभी प्रांतों में इस व्यवस्था लागू किया जाना संभव नहीं था। अकबर ने इस प्रणाली को लाहौर से इलाहबाद तक और मालवा तथा गुजरात में लागू किया था। सिंघ, काबुल के कुछ  भाग, कांधार और कश्मीर, बंगाल आदि स्थानों पर अन्य प्रणालियों का प्रचलन था।

लाभ

अकबर की इस लगान व्यवस्था में किसान प्रसन्न और सुखी थे। उनका लगान निश्चित था। पैदावार या गल्ले की कीमत बढ़ने से जो अतिरिक्त लाभ होता था, वह उन्हीं को मिलता था क्योंकि राज्य लगान में वृद्धि नहीं करता था। दूसरी तरफ इससे किसानो को कृषि सुधार हेतु प्रोत्साहन मिला। इसके अलावा किसानों को यह भी सुविधा थी कि उनकी फसले नष्ट होने या उनकी हानि होने पर लगान कम या माफ किया जा सकता था।

किसानों से राज्य का प्रत्यक्ष संपर्क था और यहां तक कि जमींदारों की भूमि की देखभाल भी शाही कर्मचारियों के हाथ में थी। इससे बहुत बड़े क्षेत्र में जागीरदार या जमींदार जैसे शोषण करने वाले वर्ग नहीं थे। इससे किसान सम्पन्न हुए। कृषि की उन्नति हुई तथा व्यापार और उद्योगों को बढ़ावा मिला। इससे राज्य को भी लाभ मिला।

 

दोष -- कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने अंग्रेजी काल की लगान व्यवस्था को  श्रेष्ठ बताने के उद्देश्य से अकबर की लगान व्यवस्था में कुछ दोष भी बताए हैं। उनके अनुसार लगान कर्मचारी भ्रष्ट थे और किसानों से लगान काफी अधिक मात्रा में लिया जाता था। लेकिन ये आरोप बेबुनियाद है।

भ्रष्टाचार थोड़ा बहुत हो प्रत्येक समय में रहता ही है उसे पूर्णतया समाप्त करना  असंभव हैं। लगान के अधिक होने की बात भी गलत है। पैदावार का 1/3 भाग मध्ययुग में न्यूनतम माना जाता था। शेरशाह जो किसानों की भलाई के लिए बहुत प्रयत्नशील था, पैदावार के 1/3 भाग के अलावा जरीबाना, मुहासिलाना और सुरक्षा कर भी लेता था। जबकि अकबर ने 1/3 भाग के अतिरिक्त अन्य सभी करो को हटा था। इस कारण किसानों पर कर का भार अधिक नहीं था।

 

Note -1, यद्यपि दहसाला बंदोबस्त दस साल के लिया किया गया, लेकिन राज्य कभी भी इसमें परिवर्तन कर सकता था। लेकिन कुछ परिवर्तनों के साथ यह व्यवस्था सत्रहवी सदी के अंत तक मुगल- भूराजस्व प्रणाली का आधार बनी रही।

2. आइने दहसाला को शाहजहाँ के शासनकाल में दक्षिण भारत में मुर्शिद कुलीखां ने लागू किया था, इस कारण उसे दक्षिण भारत का टोडरमल भी कहा जाता है।

 

अकबर के अधीन राजस्व निर्धारण की और भी प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता था। सबसे आम और सबसे प्राचीन प्रणाली का नाम था बंटाई गल्ला बक्शी । इस प्रणाली में उपज निर्धारित अनुपात में किसानों और राज्य के बीच बाँट दी जाती थी। फसल दौनी के बाद (अनाज को निकालने के बाद - रास बंटाई) या काट कर गट्ठर बाँधने के बाद (लाग बंटाई) अथवा जब खेत में खड़ी से ( खेत बटाई) उसी समय बाँट दी जाती थी। लेकिन इसके लिए फसल की कटाई के समय या उसके पकते समय ईमानदार सरकारी अमलो की एक पूरी फौज की मौजूदगी की जरूरत रहती थी। जब औरंगजेब ने दक्कन में  यह व्यवस्था लागू की थी, जो केवल फसल की निगरानी की व्यवस्था  के कारण राजस्व वसूली की लागत दुगुनी हो गई थी।

 

अकबर के अधीन प्रचलित एक तीसरी पद्धति का नाम  नसक (नस्क ) था। यह किसान द्वारा अतीत में अदा किए गए लगान के आधार पर मौजूदा देनदारी के बारे में लगाया गया मोटा हिसाब होता था (इसे किसी भी प्रकार के राजस्व निर्धारण या वसूली प्रणाली में अपनाया जा सकता था। [नस्क ए जब्ती / नस्क ए गल्लाबक्शी) औरंगजेब के काल में आमतौर पर नस्क की पद्धति को ही अपनाया गया था।

राजस्व  के एक मुश्त निर्धारण की एक और पद्धति कनकूत थी जिसे नस्क का ही एक प्रकार माना गया है।

कुछ इलाको में राजस्व निर्धारण हेतु इजारा (ठेके की प्रथा का भी प्रचलन  था। यद्यपि नियमत: मुगलो ने इसे स्वीकार नहीं किया था परन्तु व्यवहार में कभी कभी गाँवों को इजारे या ठेके पर दिया जाता । शाहजहाँ के काल में इसका विकास हुआ था। इससे शासन व्यय में तो कमी आई परन्तु किसानों का शोषण बढ गया